सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजो स्वयं भोजन कर लेता है, वह चाण्डाल होता है॥11॥ भाव यह है कि अतिथि को भारतीय संस्कृति में देवता समान माना गया है। जो व्यक्ति अतिथि से पूछे बिना अर्थात् उसका आदर-सत्कार किए बिना ही भोजन कर लेता है, वह किसी नीच से कम नहीं। पठन्ति चतुरो वेदान् धर्मशास्त्राण्यनेकशः। आत्मानं नैव जानन्ति दर्वी पाकरसं यथा॥ बुद्धिहीन ब्राह्मण वैसे तो चारों वेदों और अनेक शास्त्रों का अध्ययन करते हैं, पर आत्मज्ञान को वे नहीं समझ पाते या उसे समझने का प्रयास ही नहीं करते। ऐसे ब्राह्मण उस कलछी की तरह होते हैं, जो तमाम व्यंजनों में तो चलती है, पर रसोई के रस को नहीं जानती॥12॥ भाव यह है कि वेद-शास्त्रों के अध्ययन की सार्थकता तभी है, जब उनके मर्म को समझा जाए और आत्मज्ञान को जाना जाए कि आत्मा क्या है? उसका परमात्मा से क्या संबंध है? जब तक यह नहीं जाना जाएगा, तब तक किसी भी प्रकार का ज्ञान व्यर्थ है। धन्या द्विजमयी नौका विपरीता भवार्णवे। तरन्त्यधोगताः सर्वे उपरिस्थाः पतन्त्यधः॥ इस संसार सागर को पार करने के लिए ब्राह्मण रूपी नौका प्रशंसा के योग्य है, जो उल्टी दिशा की ओर बहती है। इस नाव में ऊपर बैठने वाले पार नहीं होते, किंतु नीचे बैठने वाले पार हो जाते हैं। अतः सदा नम्रता का ही व्यवहार करना चाहिए॥13॥ 158