सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइस श्लोक का भाव यही है कि जो लोग ब्राह्मणों के प्रति नम्र रहते हैं, उनकी सेवा करते हैं, उनका उद्धार हो जाता है, किन्तु जो ब्राह्मण के सम्मुख अपने बड़प्पन का रोब झाड़ते हैं, अपना अहंकार प्रदर्शित करते हैं, उनका उद्धार कभी नहीं हो पाता। अयममृतनिधानं नायकोऽप्योषधीनां, कमलासहजातः कान्तियुक्तोऽपि चन्द्रः। भवति विगतरश्मिर्मण्डलं प्राप्य भानोः, परसदननिविष्टः को लघुत्वं न याति॥ पराए घर में रहने से कौन छोटा नहीं हो जाता? यह देखो अमृत का खजाना, औषधियों का स्वामी, श्री और शोभा से युक्त यह चन्द्रमा, जब सूर्य के प्रभा-मंडल में आता है तो प्रकाशहीन हो जाता है॥14॥ दूसरों की पराधीनता में जाने से आदमी का स्वाभिमान नष्ट हो जाता है। अलिरयं नलिनीदलमध्यगः कमलिनीमकरन्दमदालसः। विधिवशात् परदेशमुपागतः कुटजपुष्परसं बहु मन्यते॥ कुमुदिनी के पत्तों के मध्य विकसित उसके पराग कणों से मस्त हुआ भौंरा, जब भाग्यवश किसी दूसरी जगह पर जाता है तो वहां मिलने वाले कटसरैया के फूलों के रस को भी अधिक महत्त्व देने लगता है॥15॥ इस पद का भाव यह है कि परदेश सुखकर नहीं होता। परदेश में भौंरे की भांति आदमी को अनेक कष्टों को झेलना पड़ता है। वहां जो मिल जाए, उसी पर संतोष करना पड़ता है। 159 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri