सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपीतः क्रुद्धेन तातश्चरणतलहतो वल्लभो येन रोषाद् आबाल्याद्विप्रवर्यैः स्ववदनविवरे धार्यते वैरिणी मे। गेहं मे छेदयन्ति प्रतिदिवसमुमाकान्तपूजानिमित्तं तस्माति खिन्ना सदाहं द्विजकुलनिलयं नाथ! युक्तं त्यजामि॥ लक्ष्मी भगवान विष्णु से कहती है 'हे नाथ! ब्राह्मण वंश के आगस्त्य ऋषि ने मेरे पिता (समुद्र) को क्रोध से पी लिया, विप्रवर भृगु ने मेरे परमप्रिय स्वामी (श्री विष्णु) की छाती में लात मारी, बड़े-बड़े ब्राह्मण विद्वानों ने बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक मेरी शत्रु सरस्वती को अपनी वाणी में धारण किया और ये (ब्राह्मण) उमापति (शंकर) की पूजा के लिए प्रतिदिन हमारा घर (श्रीफल पत्र आदि) तोड़ते हैं। हे नाथ ! इन्हीं कारणों से सदैव दुःखी मैं आपके साथ रहते हुए भी ब्राह्मण के घर को छोड़ देती हूं।' ।।16।। प्रस्तुत पंक्तियों में लक्ष्मी का संवाद विष्णु के साथ कराया गया है और उस कारण को बताया गया है, जिसकी वजह से लक्ष्मी ब्राह्मणों के घर में नहीं रहतीं। ब्राह्मणों से मानो उनका वैर है क्योंकि ब्राह्मणों (अगस्त्य ऋषि) ने समुद्र (जिससे कि उनकी उत्पत्ति हुई) को पी डाला, (भृगु ऋषि ने) भगवान विष्णु (उनके पति) को लात मारी और उनकी सौत सरस्वती को गले लगाया है, अर्थात विद्या ही सबसे बड़ा धन है। बंधनानि खलु सन्ति बहूनि प्रेमरज्जुदृढ बंधमन्यत्। दारुभेदनिपुणोऽपि षडंघ्रिर निष्क्रियो भवति पंकजकोशे॥ यह निश्चय है कि बंधन अनेक हैं, परंतु प्रेम का बंधन निराला है। देखो, लकड़ी को छेदने में समर्थ भौंरा कमल की पंखुड़ियों में उलझकर क्रियाहीन हो जाता है, अर्थात प्रेम रस से मस्त 160 CC0 Vasistha Tripathi Collection, Digitized by eGangotri सम्पूर्ण चाणक्य नीति-10