सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहुआ भौंरा कमल की पंखुड़ियों को नष्ट करने में समर्थ होते हुए भी उसमें छेद नहीं कर पाता।।17।। इस श्लोक में राजनीति के पंडित आचार्य चाणक्य ने दर्शाया है कि प्रेम का बंधन अटूट है। उसे तोड़ना अत्यन्त कठिन है। जो प्राणी इस संसार के माया-मोह में फंस जाता है वह भौंरे की तरह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। जिस प्रकार भौंरा कमल के मोह में फंसकर उसकी पंखुड़ियों में कैद होकर अपना जीवन गंवा देता है। छिन्नोऽपि चन्दनतरुर्न जहाति गन्धम्, वृद्धोऽपि वारणपतिर्न जहाति लीलाम्। यन्त्रार्पितो मधुरतां न जहाति चेक्षुः, क्षीणोऽपि न त्यजति शीलगुणान् कुलीनः॥ चन्दन का कटा हुआ वृक्ष भी सुगंध नहीं छोड़ता, बूढ़ा होने पर भी गजराज क्रीड़ा नहीं छोड़ता, ईख कोल्हू में पिसने के बाद भी अपनी मिठास नहीं छोड़ती और कुलीन व्यक्ति दरिद्र होने पर भी सुशीलता आदि गुणों को नहीं छोड़ता।।18।। भाव यह है कि जन्म से ही जो शाश्वत गुण मनुष्य को प्राप्त होते हैं, वे अंत तक साथ नहीं छोड़ते। उर्व्यां कोऽपि महीधरो लघुत्तरो दोर्भ्यां धृतो लीलया, तेन त्वं दिवि भूतले च सततं गोवर्धनो गीयसे। त्वां त्रैलोक्यधरं वहामि कुचयोरग्रेण तद्गण्यते, किं या केशव भाषणेन बहुना पुण्यैर्यशो लभ्यते॥ श्रीकृष्ण को उलाहना देती हुई गोपी कहती है कि हे कन्हैया! तुमने एक बार गोवर्धन नामक पर्वत को क्या उठा लिया 161 CC0 Vasistha Tripathi Collection Digitized by eGangotri