सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ अथ पंचदश अध्याय ॥ यस्य चित्तं द्रवीभूतं कृपया सर्वजन्तुषु। तस्य ज्ञानेन मोक्षेण किं जटाभस्मलेपनैः॥ जिसका हृदय सभी प्राणियों पर दया करने हेतु द्रवित हो उठता है, उसे ज्ञान, मोक्ष, जटा और भस्म लगाने की क्या जरूरत है ?।।1।। भाव यह है कि हमें सभी प्राणियों पर दया करनी चाहिए, उनसे स्नेह करना चाहिए। जो ऐसा करता है, उसका स्थान परमात्मा के समकक्ष हो जाता है। एकमेवाक्षरं यस्तु गुरुः शिष्यं प्रबोधयेत्। पृथिव्यां नास्ति तद् द्रव्यं यद्दत्वा चाऽनृणी भवेत्॥ जो गुरु एक ही अक्षर अपने शिष्य को पढ़ा देता है, उसके लिए इस पृथ्वी पर कोई अन्य चीज ऐसी महत्त्वपूर्ण नहीं है, जिसे वह गुरु को देकर उऋण हो सके ।।2।। भाव यह है कि जो गुरु अपने शिष्य को एक अक्षर का यह उपदेश दे देता है— 'तत्त्वमसि' अर्थात 'तुम ब्रह्म हो।' आत्मा तुम्हारा ही रूप है, अंश है। यह शरीर तो नाशवान है, अनित्य 154