सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकामिनी के रूप में देखता है और कुत्ते के द्वारा वह मांस के रूप में देखी जाती है।। 16।। भाव यह है कि नारी का सौंदर्य दृष्टि भ्रममात्र है। प्रत्येक व्यक्ति हर चीज को अपनी-अपनी दृष्टि से देखता है। सुसिद्धमौषधं धर्म गृहच्छिद्रं च मैथुनम्। कुभुक्तं कुश्रुतं चैव मतिमान्न प्रकाशयेत्॥ बुद्धिमान वही है जो अति सिद्ध दवा को, धर्म के रहस्य को, घर के दोष को, मैथुन अर्थात संभोग की बात को, स्वादहीन भोजन को और अतिकष्टकारी मृत्यु को किसी को न बताए। भाव यह है कि कुछ बातें ऐसी होती हैं, जिन्हें समाज में छिपाकर ही रखना चाहिए।। 17।। आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक के माध्यम से इस बात को बताया है कि छुपाने योग्य बातों को न छुपाकर मनुष्य समाज में हंसी का पात्र बनता है, कुछ मामलों में नुकसान उठाता है। तावन्मौनेन नीयन्ते कोकिलैश्चैव वासराः। यावत्सर्वजनानन्द दायिनी वाक् न प्रवर्तते॥ कोयल की वाणी तभी तक मौन रहती है, जब तक कि सभी जनों को आनन्द देने वाली वाणी प्रारम्भ नहीं हो जाती।। 18।। भाव यह है कि आम्रमंजरी के फूलने के बाद ही कोयल कूकती है क्योंकि आम्रमंजरी की भीनी सुगंध से आनन्दित होकर वसंत ऋतु में लोगों की मीठी वाणी भी चहकने लगती है। धर्मं धनं च धान्यं च गुरोर्वचनमौषधम्। सुगृहीतं च कर्त्तव्यमन्यथा तु न जीवति॥ धर्म, धन, अन्न, गुरु का उपदेश और गुणकारी औषधि का संग्रह अच्छी प्रकार से करना चाहिए। अन्यथा जीवन का 152