सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयदीच्छसि वशीकर्तुं जगदेकेन कर्मणा। पंचदशास्येभ्यो गां चरन्ती निवारय॥ यदि एक ही कर्म से समस्त संसार को वश में करना चाहते हो तो पंद्रह मुखों से विचरण करने वाले मन को रोको, अर्थात उसे वश में करो। पंद्रह मुख हैं—मुंह, आंख, कान, नाक, जीभ, त्वक्, हाथ, पैर, लिंग, गुदा, रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द।।14। कहीं-कहीं इस श्लोक की दूसरी पंक्ति में 'परापवादशस्येभ्यो' शब्द भी मिलता है, तब इसका अर्थ 'परनिन्दा' हो जाएगा। तब अर्थ होगा—'यदि एक ही कर्म से सारे संसार को वश में करना चाहते हो तो परनिन्दा करना बंद कर दो। मन को वश में करना और परनिन्दा न करना, दोनों ही उचित लगते हैं। ऐसा करके आपके हाथों में वशीकरण मंत्र की शक्ति आ सकती है। प्रस्तावसदृशं वाक्यं प्रभावसदृशं प्रियम्। आत्मशक्तिसमं कोपं यो जानाति स पंडितः॥ जो प्रस्ताव के योग्य बातों को, प्रभाव के अनुसार प्रिय कार्य को या वचन को और अपनी शक्ति के अनुसार क्रोध करना जानता है, वही पंडित है।।15।। आचार्य चाणक्य ने उपरोक्त श्लोक में बताया है कि प्रसंग अनुकूल बात करनी चाहिए, यदि प्रसन्नता का मौका है तो उसमें प्रसन्नता की बातें होनी चाहिए। इसी तरह अन्य योग्यताओं का वर्णन किया है। एक एव पदार्थस्तु त्रिधा भवति वीक्षितः। कुणपः कामिनी मांसं योगिभिः कामिभिः श्वभिः॥ एक ही वस्तु को तीन दृष्टियों से देखा जा सकता है। जैसे सुंदर स्त्री को योगी मृतक के रूप में देखता है, कामुक व्यक्ति उसे 151 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri