सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
पृष्ठ 152, कुल 196 में से
संदर्भ में पढ़ेंअत्यासन्ना विनाशाय दूरस्था न फलप्रदाः। सेव्यन्ता मध्यभागेन वह्निन्गुरुः स्त्रियः॥ राजा, अग्नि, गुरु और स्त्री, इनसे सामान्य व्यवहार करना चाहिए क्योंकि अत्यंत समीप होने पर ये नाश के कारण होते हैं और दूर रहने पर इनसे कोई फल प्राप्त नहीं होता।।11।। भाव यह है कि इनसे व्यवहार करते समय मध्यम मार्ग अपनाएं। 'न नीम से कड़वा और न गुड़ से मीठा।' ज्यादा दूरी भी नहीं और ज्यादा पास भी नहीं। अग्निरापः स्त्रियो मूर्खः सर्पा राजकुलानि च। नित्यं यत्नेन सेव्यानि सद्यः प्राणहराणि षट्॥ अग्नि, पानी, स्त्रियां, मूर्ख, सांप और राजाकुल से निकट संबंध सावधानी के साथ करना चाहिए क्योंकि ये छः तत्काल प्राणों को हरने वाले हैं।। 12।। प्रस्तुत श्लोक में आचार्य चाणक्य ने अग्नि, पानी, स्त्रियां, मूर्ख, सांप और राजवंश से सतर्क रहने की बात कही है। उनके अनुसार अग्नि के प्रति, जल के प्रति, स्त्री के प्रति, मूर्ख व्यक्ति के प्रति, सर्प के प्रति और राजवंश के प्रति यदि जरा भी असावधानी दिखाई तो प्राण संकट में पड़ सकते हैं। इनसे बहुत सावधान रहना चाहिए। स जीवति गुना यस्य यस्य धर्मः स जीवति। गुणधर्मविहीनस्य जीवितं निष्प्रयोजनम्॥ जिसके पास गुण हैं, जिसके पास धर्म है, वही जीवित है। गुण और धर्म से विहीन व्यक्ति का जीवन निरर्थक है।। 13।। चाणक्य ने मनुष्य में गुण के उपस्थित होने पर बल दिया है। गुण से तात्पर्य दयाभाव, जगत-कल्याण की भावना तथा परोपकार है। CCO. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri 150