भारतकोश
सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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दाने तपसि शौर्ये च विज्ञाने विनये नये। विस्मयो न हि कर्त्तव्यो बहुरत्ना वसुंधरा॥ दान, तपस्या, वीरता, ज्ञान, नम्रता, किसी में ऐसी विशेषता को देखकर आश्चर्य नहीं करना चाहिए क्योंकि इस दुनिया में ऐसे अनेक रत्न भरे पड़े हैं॥8॥ भाव यह है कि दुनिया में एक से बढ़कर एक व्यक्ति ऐसे हैं जो दान, तप, वीरता, ज्ञान और संवेदनशीलता में बढ़े-चढ़े हैं। कहां तक आश्चर्य किया जा सकता है। दूरस्थोऽपि न दूरस्थो यो यस्य मनसि स्थितः। यो यस्य हृदये नास्ति समीपस्थोऽपि दूरतः॥ जो जिसके मन में है, वह उससे दूर रहकर भी दूर नहीं है और जो जिसके हृदय में नहीं है, वह समीप रहते हुए भी दूर है॥9॥ भाव यह है कि सच्चा प्रेम हृदय से होता है, उसमें दूरी का अथवा पास का कोई व्यवधान नहीं होता। सच्चे प्रेम में प्रिय हर समय आंखों के सम्मुख ही रहता है। यस्य चाप्रियमिच्छेत तस्य ब्रूयात् सदा प्रियम्। व्याधो मृगवधं कर्तुं गीतं गायति सुस्वरम्॥ जिससे अपना हित साधना हो, उससे सदैव प्रिय बोलना चाहिए जैसे मृग को मारने के लिए बहेलिया मीठे स्वर में गीत गाता है॥10॥ यहां चाणक्य ने कूटनीति की ओर इशारा किया है कि अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए राजा को सदैव अपने शत्रु से मीठा-व्यवहार करना चाहिए। उससे मधुर-वाणी में बात करनी चाहिए। 149