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सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

अध्याय १०-१२: आत्म-रक्षा, गुप्त-मन्त्रणा व नीति-सार

मित्र के गुप्त रहस्यों को कभी प्रकट न करें। इससे केवल शत्रुता ही पैदा होती है। गंधः सुवर्णे फलमिक्षुदंडे, नाऽकारि पुष्पं खलु चंदनस्य। विद्वान धनाढ्यश्च नृपश्चिरायुः, धातुः पुराकोऽपि न बुद्धिदोऽभूत् ॥ ब्रह्मा को शायद कोई बताने वाला नहीं मिला जो कि उन्होंने सोने में सुगंध, ईख में फल, चंदन में फूल, विद्वान को धनी और राजा को चिरंजीवी नहीं बनाया।।3।। यह सृष्टिकर्त्ता की कैसी विडम्बना है कि उसने स्वर्ण में सुगंध नहीं डाली, गन्ने पर फल नहीं लगाया, चंदन के वृक्ष पर फूल नहीं उगाए, विद्वान को धनवान नहीं बनाया और राजा को, जो कि प्रजापालक है, दीर्घजीवी नहीं बनाया। सर्वौषधीनाममृता प्रधाना, सर्वेषु सौख्येष्वशनं प्रधानम्। सर्वेन्द्रियाणां नयनं प्रधानं, सर्वेषु गात्रेषु शिरः प्रधानम् ॥ सभी औषधियों में अमृत प्रधान है, सभी सुखों में भोजन प्रधान है, सभी इन्द्रियों में नेत्र प्रधान है और सारे शरीर में सिर श्रेष्ठ है।।4।। अमृत से जीवन को अमरता प्राप्त होती है, भोजन से शरीर पुष्ट होता है, तृप्ति प्राप्त होती है, आंखों के बिना सारा संसार ही अंधकार में डूब जाता है और दिमाग के बिना तो चिन्तन ही असंभव है। दूतो न संचरति खे न चलेच्च वार्ता पूर्वं न जल्पितमिदं न च संगमोऽस्ति। व्योम्नि स्थितं रविशशिग्रहणं प्रशस्तं जानाति यो द्विजवरः स कथं न विद्वान् ॥ न तो आकाश में कोई दूत गया, न इस संबंध में किसी से 104 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

बात हुई, न पहले किसी ने इसे बनाया और न कोई प्रकरण ही आया, तब भी आकाश में भ्रमण करने वाले चंद्र और सूर्य के ग्रहण के बारे में जो ब्राह्मण पहले से ही जान लेता है, वह विद्वान क्यों नहीं है? अर्थात् वास्तव में वह विद्वान है, जिसकी गणना से ग्रहों की चाल का सही-सही पता लगाया जाता रहा है॥5॥ आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक में उन विद्वानों की विद्वता की प्रशंसा की है जिन्होंने सूर्य-चंद्र की स्थितियों की हमें जानकारी दे रखी है। आकाश में कोई दूत नहीं जा सकता, न ही वहां किसी से कोई वार्तालाप हो सकता है, न पहले से किसी ने कुछ बता ही रखा है और न वहां किसी से संगम हो सकता है, फिर भी जो ब्राह्मण श्रेष्ठ आकाश में स्थित सूर्य और चंद्रमा के ग्रहण को जान लेता है, वह विद्वान क्यों नहीं है? विद्यार्थी सेवकः पान्थः क्षुधाऽऽर्त्तो भयकातरः। भाण्डारी प्रतिहारी च सप्त सुप्तान् प्रबोधयेत् ॥ विद्यार्थी, नौकर, पथिक, भूख से व्याकुल, भय से त्रस्त, भंडारी और द्वारपाल, इन सातों को सोता हुए देखें तो तत्काल जगा देना चाहिए क्योंकि अपने समस्त कर्मों और कर्त्तव्यों का पालन ये जागकर अर्थात सचेत होकर ही करते हैं॥6॥ विद्यार्थी यदि सोयेगा तो पढ़ेगा कैसे ? नौकर यदि सोयेगा तो डांका पड़ सकता है, मुसाफिर यदि सोयेगा तो लुट जाएगा, भूख से व्याकुल व्यक्ति को भोजन करा देना चाहिए। उसे तो वैसे ही नींद न आएगी। भंडारगृह का स्वामी और द्वारपाल सोते रहेंगे तो चोरों को चोरी करने का अवसर मिल सकता है। अतः इन्हें सदैव सावधान रहना चाहिए। 105 CC0. Vasishtha Tripathi Collection Digitized by eGangotri

अहिं नृपं च शार्दूलं किटिंच बालकं तथा। परश्वानं च मूर्खं च सप्त सुप्तान् बोधयेत् ॥ सांप, राजा, सिंह, बर्र (ततैया) और बालक, दूसरे का कुत्ता तथा मूर्ख व्यक्ति, इन सातों को सोते से नहीं जगाना चाहिए। इन्हें जगाने से हानि ही हो सकती है॥7॥ आचार्य चाणक्य ने उपरोक्त श्लोक में जिन सात को सोते से न जागने की बात कही है उनकी हानि इस प्रकार है—सांप डस लेगा, राजा दंड देगा, व्याघ्र या चीता आक्रमण कर मार डालेगा, बालक रोने लगेगा, दूसरों का कुत्ता जगाए जाने पर काट लेगा, मूर्ख व्यक्ति विवाद करने लगेगा। अर्थाऽधीताश्च यैर्वेदास्तथा शूद्रान्नभोजिनाः। ते द्विजाः किं करिष्यन्ति निर्विषा इव पन्नगाः ॥ धन के लिए वेद पढ़ाने वाले तथा शूद्रों के अन्न को खाने वाले ब्राह्मण विषहीन सर्प की भांति क्या कर सकते हैं, अर्थात वे किसी को न तो शाप दे सकते हैं, न वरदान॥8॥ जो ब्राह्मण केवल धन के लिए ही अपनी विद्या को बेचते हैं, शूद्रों के यहां का भोजन करने से भी संकोच नहीं करते, ऐसे ब्राह्मणों की विद्या उस सर्प के समान है, जिसके मुख में विष की थैली ही नहीं है। अर्थात वे किसी को न तो शाप दे सकते हैं, न वरदान। यस्मिन् रुष्टे भयं नास्ति तुष्टे नैव धनाऽऽगमः। निग्रहोऽनुग्रहो नास्ति स रुष्टः किं करिष्यति ॥ जिसके नाराज होने का डर नहीं है और प्रसन्न होने से कोई लाभ नहीं है, जिसमें दंड देने या दया करने की सामर्थ्य नहीं है, वह नाराज होकर क्या कर सकता है?॥9॥ 106

भयभीत उसी से हुआ जा सकता है, जिसमें कुछ दंड देने की सामर्थ्य हो। जिसमें ऐसी सामर्थ्य नहीं है, उससे डर कैसा ? अपना हानि-लाभ देखकर ही कोई किसी से प्रभावित होता है। निर्विषेणाऽपि सर्पेण कर्तव्या महती फणा। विषमस्तु न चाप्यस्तु घटाटोपो भयंकरः ॥ विषहीन सर्प को भी अपना फन फैलाकर फुफकार करनी चाहिए। विष के न होने पर फुफकार से उसे डराना अवश्य चाहिए।।10।। यदि विषहीन सांप ऐसा नहीं करेगा तो वह अपना बचाव नहीं कर पाएगा। लोग उसे पत्थर मारेंगे। तात्पर्य यह है कि राजा के पास शक्ति चाहे थोड़ी हो, पर उसे अपनी शक्ति का दिखावा करके शत्रु को भयभीत अवश्य करते रहना चाहिए। प्रातर्धूतप्रसंगेन मध्यान्हे स्त्रीप्रसंगतः। रात्रौ चौर्यप्रसंगेन कालो गच्छत्ये धीमताम्॥ प्रातःकाल जुआरियों की कथा से (महाभारत की कथा से), मध्याह्न (दोपहर) का समय स्त्री प्रसंग से (रामायण की कथा से) और रात्रि में चोर की कथा से (श्रीमद्भागवत की कथा से) बुद्धिमान लोग अपना समय काटते हैं।।11।। जुआरियों की कथा को महाभारत की कथा से जोड़कर दिखाया है कि राजनीतिकारों को जुए की लत से कितना भारी नुकसान उठाना पड़ता है। स्त्री-प्रसंग की कथा को रामायण से जोड़कर बताया गया है कि पर स्त्री हरण से कितना बड़ा विनाश होने की संभावना रहती है और चोर की कथा को श्रीमद्भागवत से जोड़कर भगवान श्रीकृष्ण की सोलह हजार रानियों के रहते हुए भी इन्द्रिय-निग्रह की भावना का प्रतिपादन किया गया है। 107 CC0 Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

भाव यह है कि बुद्धिमान वही है जो परस्त्री-गमन से दूर रहता है और सदैव अपनी इन्द्रियों को संयम में रखने का प्रयत्न करता है। स्वहस्तग्रथिता माला स्वहस्तघृष्टचन्दनम्। स्वहस्तलिखितं स्तोत्रं शक्रस्यापि श्रियं हरेत्॥ अपने हाथों से गुंथी माला, अपने हाथों से घिसा चंदन और अपने हाथ से लिखा स्तोत्र, इन सबको अपने ही कार्य में लगाने से, देवताओं के राजा इंद्र की श्रीलक्ष्मी भी नष्ट हो जाती है॥12॥ भाव यह है कि प्रभु-मूर्ति को अपने हाथों से गुंथी माला पहनाने से, अपने हाथों से घिसा चंदन लगाने से और अपने द्वारा रचित स्तुति को गाने से संसार के किसी ऐश्वर्य की आवश्यकता नहीं रहती। इक्षुदंडास्तिलाः क्षुद्राः कान्ता हेम च मेदिनी। चन्दनं दधि ताम्बूलं मर्दनं गुणवर्धनम्॥ ईख, तिल, क्षुद्र, स्त्री, स्वर्ण, धरती, चंदन, दही और पान, इनको जितना मसला जाता है, उतनी गुण-वृद्धि होती है॥13॥ ईख पेरने से रस, तिल मथने से तेल, नीच और स्त्री को ताड़ने से अनुकूलता, स्वर्ण को तपाने से अधिक चमक, धरती में हल चलाने से उपजाऊ शक्ति की वृद्धि, दही मथने से मक्खन निकलता है और चंदन तथा पान को रगड़ने से सुगंध पैदा होती है। भाव यह है कि जीवन में जितनी अधिक साधना की जाती है, उसका उतना ही अधिक फल प्राप्त होता है। दरिद्रता धीरतया विराजते, कुवस्त्रता शुभ्रतया विराजते। कदन्नता चोष्णतया विराजते, कुरूपता शीलतया विराजते॥ दरिद्रता के समय धैर्य रखना उत्तम है, मैले कपड़ों को 108 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

साफ रखना उत्तम है, घटिया अन्न का बना गर्म भोजन अच्छा लगता है और कुरूप व्यक्ति के लिए अच्छे स्वभाव का होना श्रेष्ठ है॥14॥ भाव यह है कि दरिद्रता में यदि धैर्य रखा जाए तो दुःख नहीं होता। गरीब व्यक्ति धैर्यपूर्वक अपना बुरा समय गुजार लेता है। फटे-पुराने, मैले कपड़ों को यदि साफ-सुथरा करके और उनको अच्छी प्रकार से सीकर पहना जाए तो वे अच्छे लगते हैं। ज्वार-बाजरा-जौ-मक्का आदि घटिया अन्न की बनी रोटी यदि गर्म-गर्म खाई जाए तो स्वादिष्ट लगती है और अच्छे शील-स्वभाव का व्यक्ति यदि कुरूप भी हो तो भी वह अच्छा लगता है। 109

॥ अथ दशम अध्याय ॥ धनहीनो न हीनश्च धनिकः स सुनिश्चयः। विद्यारत्नेन यो न हीनः यः स हीनः सर्ववस्तुषु॥ निर्धन व्यक्ति हीन अर्थात छोटा नहीं है, धनवान वही है जो अपने निश्चय पर दृढ़ है, परंतु विद्या रूपी रत्न से जो हीन है, वह सभी चीजों से हीन है।।1।। किसी भी कार्य को सम्पन्न करने के लिए विद्या बहुत जरूरी है। उसी के द्वारा वह धन प्राप्त करता है। विद्या ही सच्चा धन है। दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं पिबेज्जलम्। शास्त्रपूतं वदेद् वाक्यं मनः पूतं समाचरेत्॥ अच्छी तरह देखकर पैर रखना चाहिए, कपड़े से छानकर पानी पीना चाहिए, शास्त्र से (व्याकरण से) शुद्ध करके वचन बोलना चाहिए और मन में विचार करके कार्य करना चाहिए।।2।। देख-भालकर चलने, शुद्ध जल तथा शुद्ध वचनों का प्रयोग करने और मन से भली प्रकार से सोच-समझकर कार्य करने की बात यहां कही गई है। 110 CC0. Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

सुखार्थी चेत् त्यजेद् विद्यां विद्यार्थी चेत् त्यजेत् सुखम्। सुखार्थिनः कुतो विद्या विद्यार्थिनः कुतः सुखम्॥ विद्यार्थी को यदि सुख की इच्छा है और वह परिश्रम करना नहीं चाहता तो उसे विद्या प्राप्त करने की इच्छा का त्याग कर देना चाहिए। यदि वह विद्या चाहता है तो उसे सुख-सुविधाओं का त्याग करना होगा क्योंकि सुख चाहने वाला विद्या प्राप्त नहीं कर सकता। दूसरी ओर विद्या प्राप्त करने वालों को आराम नहीं मिल सकता॥३॥ आचार्य चाणक्य ने उक्त श्लोक के माध्यम से कहा है कि सुख और विद्याप्राप्ति में वैसे ही संधि असंभव है जैसे-जैसे प्रकाश और अंधकार का मेल। एक के रहते दूसरे का अस्तित्व खोया रहता है। कवयः किं न पश्यन्ति किं न कुर्वन्ति योषितः। मद्यपाः किं न जल्पन्ति किं न भक्ष्यन्ति वायसाः॥ कवि लोग क्या नहीं देखते? स्त्रियां क्या नहीं कर सकतीं? मदिरा पीने वाले क्या-क्या नहीं बकते? कौवे क्या-क्या नहीं खाते?॥४॥ 'जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि' यह उक्ति बहुत प्रसिद्ध है कि जहां सूर्य की रश्मियां भी नहीं पहुंच पातीं, वहां कवि की कल्पना पहुंच जाती है। स्त्री जब अपनी पर आती है तो वह कुछ भी कर सकती है। शराबी जब नशे में हो जाते हैं तो कुछ उल्टा-सीधा बकने लगते हैं और कौवे न खाने योग्य खाद्य पदार्थ भी खा लेते हैं। भाव यह है कि विद्वान व्यक्ति सभी कार्य सोच-समझकर करता है और नीच व्यक्ति अपने विवेक से कार्य नहीं करता। 111

रंकं करोति राजानं राजानं रंकमेव च। धनिनं निर्धनं चैव निर्धनं धनिनं विधिः॥ भाग्य की शक्ति अत्यंत प्रबल है। वह पल में निर्धन को राजा और राजा को निर्धन बना देती है। वह धनी को निर्धन और निर्धन को धनी बना देती है॥5॥ भाग्य से जीतना असंभव है। भाग्य कब क्या कर दे, कोई नहीं जानता। इसकी लीला अपरम्पार है। इस पर किसी का वश नहीं चलता। लुब्धानां याचकः शत्रुर्मूर्खाणां बोधकः रिपुः। जारस्त्रीणां पतिः शत्रुश्चोराणां चंद्रमा रिपुः॥ लोभियों का शत्रु भिखारी है, मूर्खों का शत्रु ज्ञानी है, व्यभिचारिणी स्त्री का शत्रु उसका पति है और चोरों का शत्रु चंद्रमा है॥6॥ भाव यह है कि लोभी, मूर्ख, कुल्टा स्त्री और चोर के कार्यों में जिनके द्वारा विघ्न पड़ता है, वे सभी उनके शत्रु होते हैं क्योंकि ये सब अपनी आदतों को किसी के द्वारा समझाए जाने पर भी नहीं बदल सकते। सच ही कहा गया है कि मूर्खों को कभी उपदेश नहीं देना चाहिए। अतः मूर्ख से शिक्षा और लोभी से कुछ मांगने की भूल कभी नहीं करनी चाहिए। येषां न विद्या न तपो न दानम्, न चाऽपि शीलं न गुणो न धर्मः। ते मर्त्यलोके भुवि भारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति॥ जिसके पास न विद्या है, न तप है, न दान है और न धर्म है, वह इस मृत्युलोक में पृथ्वी पर भार स्वरूप मनुष्य रूपी मृगों के समान घूम रहा है। वास्तव में ऐसे व्यक्ति का जीवन व्यर्थ है। वह समाज के किसी काम का नहीं है॥7॥ 112 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri सम्पूर्ण चाणक्य नीति—7

आचार्य चाणक्य के प्रस्तुत श्लोक से यह संदेश मिलता है कि मनुष्य योनि में जन्म लेकर मनुष्य को विद्या ग्रहण करनी चाहिए, साधना और दान की प्रवृत्ति अपनानी चाहिए, सदाचार की भावना का पालन करना चाहिए अन्यथा उनमें और पशु में अंतर ही क्या है। अन्तःसारविहीनानामुपदेशो न जायते। मलयाचलसंसर्गात् न वेणुश्चन्दनायते॥ शून्य हृदय पर कोई उपदेश लागू नहीं होता। जैसे मलयाचल के संबंध से बांस चंदन का वृक्ष नहीं बनता॥8॥ आचार्य चाणक्य के अनुसार जिस मनुष्य में भावना नहीं, योग्यता नहीं वह किसी भी प्रकार के उपदेश से लाभ नहीं उठा सकता। जिस प्रकार मलयगिरि पर उगने से ही बांस चंदन के वृक्ष की भांति सुगंध से परिपूर्ण नहीं हो जाता। यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम्। लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति॥ जिनको स्वयं बुद्धि नहीं है, शास्त्र उनके लिए क्या कर सकता है? जैसे अंधे के लिए दर्पण का क्या महत्त्व है?॥9॥ भाव यह है कि जो पूरी तरह मूर्ख है, उनके लिए शास्त्र भी कुछ नहीं कर सकते। दुर्जनं सज्जनं कर्तुमुपायो न हि भूतले। अपानं शतधा धौतं न श्रेष्ठमिन्द्रियं भवेत्॥ इस पृथ्वी पर दुर्जन व्यक्ति को सज्जन बनाने का कोई उपाय नहीं है, जैसे सैकड़ों बार धोने के उपरान्त भी गुदा-स्थान शुद्ध इन्द्री नहीं बन सकता॥ 10॥ 113

मल त्यागने का स्थान सैकड़ों बार धोने के उपरान्त भी अशुद्ध स्थान ही माना जाता है। इस प्रकार दुर्जन व्यक्ति को कितना भी अच्छा बनाने का प्रयास किया जाए, वह सज्जन नहीं बन पाता। आत्मद्वेषाद् भवेन्मृत्युः परद्वेषाद् धनक्षयः। राजद्वेषाद् भवेन्नाशो ब्रह्मद्वेषात्कुलक्षयः॥ अपनी आत्मा से द्वेष करने से मनुष्य की मृत्यु हो जाती है-दूसरों से अर्थात शत्रु से द्वेष के कारण धन का नाश और राजा से द्वेष करने से अपना सर्वनाश हो जाता है, किंतु ब्राह्मण से द्वेष करने से सम्पूर्ण कुल का ही नाश हो जाता है।। 11।। भाव यह है कि विद्वानों, राजा, ब्राह्मण और जीवन में साथ-साथ चलने वाले परिजनों का विरोध न करके उनका स्नेह और सौहार्द्र ही प्राप्त करना चाहिए। वरं वनं व्याघ्रगजेन्द्रसेवितं, द्रुमालयः पत्रफलाम्बु सेवनम्। तृणेषु शय्या शतजीर्णवल्कलं, न बन्धुमध्ये धनहीनजीवनम्॥ बड़े-बड़े हाथियों और बाघों वाले वन में वृक्ष का कोट रूपी घर अच्छा है, पके फलों को खाना, जल का पीना, तिनकों पर सोना, पेड़ों की छाल पहनना उत्तम है, परंतु अपने भाई-बंधुओं के मध्य निर्धन होकर जीना अच्छा नहीं।। 12 ।। यहां निर्धनता के अभिशाप और धन के महत्त्व को प्रकट करते हुए चाणक्य कहते हैं कि निर्धनता हर तरह से खराब है। विप्रो वृक्षस्तस्य मूलं च संध्या, वेदाः शाखा धर्मकर्माणि पत्रम्। तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं, छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम्॥ ब्राह्मण वृक्ष है, संध्या उसकी जड़ है, वेद शाखाएं हैं, धर्म तथा कर्म पत्ते हैं इसलिए ब्राह्मण का कर्तव्य है कि संध्या की रक्षा करें क्योंकि जड़ के कट जाने से पेड़ के पत्ते व शाखाएं नहीं रहतीं।। 13 ।। 114

भाव यह है कि ब्राह्मण को अपनी साधना तथा अध्यवसाय नहीं त्यागना चाहिए। जो तपस्वी और विद्वान है, वही ब्राह्मण है। माता च कमलादेवी पिता देवो जनार्दनः। बांधवाः विष्णुभक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम्॥ जिसकी माता लक्ष्मी है, पिता विष्णु देव हैं, भाई-बंधु विष्णु के भक्त हैं, उनके लिए तीनों लोक ही अपने देश हैं।।14।। भक्त-जनों के लिए तीनों लोक उनके अपने घर के समान ही हैं। विष्णु तथा लक्ष्मी उनके माता-पिता हैं। जिस पर विष्णु-लक्ष्मी की कृपा है और जो उनके भक्तों के मध्य निवास करता है, उसके लिए तीनों लोक उसके पास हैं। एकवृक्षसमारूढा नानावर्णा विहंगमाः। प्रभाते दिक्षु दशसु का तत्र परिवेदना॥ अनेक रंग और रूपों वाले पक्षी सायं काल एक वृक्ष पर आकर बैठते हैं और प्रातः काल दसों दिशाओं में उड़ जाते हैं। ऐसे ही बंधु-बांधव एक परिवार में मिलते हैं और बिछुड़ जाते हैं। इस विषय में शोक कैसा ?।।15।। आचार्य चाणक्य ने इस श्लोक के द्वारा कहा है कि जो भी जड़-चेतन इस संसार में जन्मा है, उसकी मृत्यु निश्चित है, जब मृत्यु एक शाश्वत सत्य है, फिर इसके लिए शोक-संताप कैसा ? प्रलाप कैसा ? प्रकृति के जन्म-मृत्यु से चिंतित होने से कोई लाभ नहीं। बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेश्च कुतो बलम्। वने सिंहो मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः॥ जो बुद्धिमान है, वही बलवान है, बुद्धिहीन के पास शक्ति 115

नहीं होती। जैसे जंगल में सबसे अधिक बलवान होने पर भी सिंह मतवाला होकर खरगोश के द्वारा मारा जाता है॥16॥ 'पंचतंत्र' में यह कथा आई है, जिसमें एक खरगोश अपनी चतुराई से सिंह की परछाई कुएं में दिखाकर, परछाई को उसका प्रतिद्वन्द्वी बता देता है। सिंह कुएं में उस पर छलांग लगा देता है और कुएं में डूबकर मर जाता है, अर्थात बुद्धि बल से बड़ी है। बुद्धि के द्वारा ताकतवर मनुष्य को भी पराजित किया जा सकता है। का चिंता मम जीवने यदि हरिविश्वम्भरो गीयते, नो चेदर्भकजीवनाय जननीस्तन्यं कथं निर्मयेत्। इत्यालोच्य मुहुर्मुहुर्यदुपते लक्ष्मीपते केवलं, त्वत्पादाम्बुजसेवनेन सततं कालो मया नीयते॥ यदि भगवान जगत के पालनकर्ता हैं तो हमें जीने की क्या चिन्ता है? यदि वे रक्षक न होते तो माता के स्तनों से दूध क्यों निकलता? यही बार-बार सोचकर हे लक्ष्मीपति! अर्थात विष्णु! मैं आपके चरण-कमल में सेवा हेतु समय व्यतीत करना चाहता हूं॥17॥ विष्णु की उपासना के साथ-साथ कर्महीन होकर बैठ जाने की मंशा यहां नहीं है। भगवान उसी के सहायक होते हैं जो कर्म करता है। गीर्वाणवाणीषु विशिष्टबुद्धिस्तथापि भाषान्तरलोलुपोऽहम्। यथा सुराणाममृते स्थितेऽपि स्वर्गांगनानामधरासवे रुचिः॥ यद्यपि मेरी बुद्धि देववाणी (संस्कृत) में श्रेष्ठ है, तब भी मैं दूसरी भाषा का लालची हूं। जैसे अमृत पीने पर भी देवताओं की इच्छा स्वर्ग की अप्सराओं के ओष्ट रूपी मद्य को पीने की बनी रहती है॥18॥ 116 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

भाव यह है कि भले ही हम किसी श्रेष्ठ भाषा में पारंगत हों, पर दूसरी अन्य भाषाओं को जानने और समझने के लिए हमें सदा प्रयत्नशील रहना चाहिए। इससे ज्ञान बढ़ता है। अन्नाद् दशगुणं पिष्टं पिष्टाद् दशगुणं पयः। पयसोऽष्टगुणं मांसं मांसाद् दशगुणं घृतम्॥ अन्न की अपेक्षा उसके चूर्ण अर्थात पिसे हुए आटे में दस गुना अधिक शक्ति होती है। दूध में आटे से भी दस गुना अधिक शक्ति होती है। मांस में दूध से भी आठ गुना अधिक शक्ति होती है और घी में मांस से भी दस गुना अधिक बल है॥19॥ अतः मांस खाने वालों को घृत के सेवन का अभ्यास डालना चाहिए। आज दालें तथा सूखे मेवे भी मांस की पूर्ति कर सकने में समर्थ हैं। उनमें भी प्रोटीन काफी मात्रा में मिलता है। शाकेन रोगा वर्द्धन्ते पयसा वर्द्धते तनुः। घृतेन वर्धते वीर्यं मांसान्मांसं प्रवर्धते॥ • साग खाने से रोग बढ़ते हैं, दूध से शरीर बलवान होता है, घी से वीर्य (शक्ति) बढ़ता है और मांस खाने से मांस ही बढ़ता है॥20॥ अतः बल-बुद्धि और शक्ति के लिए घी-दूध का सेवन ही उत्तम है, मांस नहीं। साग-सब्जी से रोग तभी बढ़ते हैं, जब उन्हें अच्छी प्रकार से धोकर शुद्ध नहीं कर लिया जाता। शुद्ध न करने पर उसमें बाह्य कीटाणु रह जाते हैं, जो रोग बढ़ाते हैं। 117

॥ अथ एकादश अध्याय ॥ दातृत्वं प्रियवक्तृत्वं धीरत्वमुचितज्ञता। अभ्यासेन न लभ्यन्ते चत्वारः सहजा गुणाः॥ दान देने का स्वभाव, मधुर वाणी, धैर्य और उचित की पहचान, ये चार बातें अभ्यास से नहीं आतीं, ये मनुष्य के स्वाभाविक गुण हैं। ईश्वर के द्वारा ही ये गुण प्राप्त होते हैं। जो व्यक्ति इन गुणों का उपयोग नहीं करता, वह ईश्वर के द्वारा दिए गए वरदान की उपेक्षा ही करता है और दुर्गुणों को अपनाकर घोर कष्ट भोगता है॥1॥ आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक के माध्यम से बताया है कि निरंतर अभ्यास से मनुष्य अनेक गुणों को प्राप्त कर सकता है, परंतु अभ्यास से सबकुछ प्राप्त नहीं हो सकता। कुछ गुण ऐसे होते हैं जो स्वाभाविक होते हैं। उनका वर्णन श्लोक में किया गया है। आत्मवर्गं परित्यज्य परवर्गं समाश्रयेत्। स्वयमेव लयं याति यथा राजाऽन्यधर्मतः॥ जो अपने वर्ग को छोड़कर दूसरे के वर्ग का आश्रय ग्रहण करता है, वह स्वयं ही नष्ट हो जाता है, जैसे राजा अधर्म के द्वारा नष्ट 118 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

हो जाता है। उसके पाप कर्म उसे नष्ट कर डालते हैं॥2॥ वस्तुतः जो व्यक्ति अपनों का न हुआ, वह दूसरों का कैसे हो सकता है ? अपनों को त्यागना ही अधर्म के मार्ग पर चलना है, जिससे अन्ततः हानि ही होती है। हस्ती स्थूलतनुः स चांकुशवशः किं हस्तिमात्रोऽङ्कुशः दीपे प्रज्वलिते प्रणश्यति तमः किं दीपमात्रं तमः। वज्रेणापि हताः पतन्ति गिरयः किं वज्रमात्रं गिरिस् तेजो यस्य विराजते सः बलवान् स्थूलेषु कः प्रत्ययः॥ हाथी मोटे शरीर वाला है, परंतु अंकुश से वश में रहता है। क्या अंकुश हाथी के बराबर है? दीपक के जलने पर अंधकार नष्ट हो जाता है। क्या दीपक अंधकार के बराबर है? वज्र से बड़े-बड़े पर्वत शिखर टूटकर गिर जाते हैं। क्या वज्र पर्वतों के समान है? सत्यता यह है कि जिसका तेज चमकता रहता है, वही बलवान है। मोटेपन से बल का अहसास नहीं होता॥3॥ भाव यह है कि किसी के आकार को देखकर उसकी शक्ति का अनुमान नहीं लगा लेना चाहिए। शक्ति साहस में होती है। कलौ दशसहस्रेषु हरिस्त्यजति मेदिनीम्। तदर्द्धं जाह्नवीतोयं तदर्द्धं ग्रामदेवता॥ कलियुग के दस हजार वर्ष बीतने पर श्रीविष्णु (पालनकर्ता) इस पृथ्वी को छोड़ देते हैं, उसके आधा बीतने पर गंगा का जल समाप्त हो जाता है और उसके आधा बीतने पर ग्राम के देवता भी पृथ्वी को छोड़ देते हैं॥4॥ भाव यह है कि कलियुग के दस हजार वर्ष बीतने के बाद इस धरती से जीवन-यापन के सभी समुचित साधन नष्ट हो 119 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

जाएंगे और दस हजार के आधे अर्थात् अगले पांच हजार वर्ष बीतने पर पापों का नाश करके मन को पवित्र करने वाली गंगा का जल भी समाप्त हो जाएगा और फिर उसके आधे अर्थात् अगले ढाई हजार साल बीतने पर धरती की कृषि-भूमि भी नष्ट हो जाएगी। इसका अर्थ यह है कि कलियुग के साढ़े सत्रह हजार वर्ष बीत जाने पर पुनः प्रलय होगी और यह धरती जल में डूब जाएगी। गृहाऽऽसक्तस्य नो विद्या नो दया मांसभोजिनः। द्रव्यलुब्धस्य नो सत्यं स्त्रैणस्य न पवित्रता॥ घर-गृहस्थी में आसक्त व्यक्ति को विद्या नहीं आती। मांस खाने वाले को दया नहीं आती। धन के लालची को सच बोलना नहीं आता और स्त्री में आसक्त कामुक व्यक्ति में पवित्रता नहीं होती॥5॥ विद्या प्राप्ति के लिए गृह-त्याग करके गुरु के पास जाना जरूरी है। मांसाहारी व्यक्ति दया भूल जाता है। लालची व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए बार-बार झूठ का सहारा लेता है और कामुक व्यक्ति सदा स्त्री-सम्भोग में लिप्त रहता है, तब वह पवित्र कैसे हो सकता है। न दुर्जनः साधुदशामुपैति बहुप्रकारैरपि शिक्ष्यमाणः। आमूलसिक्तः पयसा घृतेन न निम्बवृक्षो मधुरत्वमेति॥ जिस प्रकार नीम के वृक्ष की जड़ को दूध और घी से सींचने के उपरांत भी वह अपनी कड़वाहट छोड़कर मृदुल नहीं हो जाता, ठीक इसी के अनुरूप दुष्ट प्रवृत्तियों वाले मनुष्यों पर सदुपदेशों का कोई भी असर नहीं होता॥6॥ कहने का आशय यह है कि दुष्ट मनुष्य की आदत बन चुके अवगुणों को बदला नहीं जा सकता। 120 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

अंतर्गतमलो दुष्टस्तीर्थस्नानशतैरपि। न शुध्यति यथा भाण्डं सुराया दाहितं च सत्॥ जिस प्रकार शराब वाला पात्र अग्नि में तपाए जाने पर भी शुद्ध नहीं हो सकता, उसी प्रकार जिस मनुष्य के हृदय में पाप और कुटिलता भरी होती है, सैकड़ों तीर्थ स्थानों पर स्नान करने से भी ऐसे मनुष्य पवित्र नहीं हो सकते॥7॥ भाव यही है कि जब तक मनुष्य अपने मन की मलिनता अर्थात् पाप में प्रवृत्त होने की भावना का त्याग नहीं करता, तब तक उसके तीर्थ-स्नान करने से भी कोई लाभ नहीं है। वह पापी ही बना रहता है। वह सैकड़ों तीर्थ-स्नानों पर स्नान करने से भी पवित्र नहीं हो पाता। न वेत्ति यो यस्यगुणप्रकर्षं स तं सदा निन्दति नाऽत्र चित्रम्। यथा किराती करिकुम्भजाता मुक्तां परित्यज्य बिभर्ति गुंजाः॥ इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि जो जिसके गुणों के महत्त्व को नहीं जानता, वह उसकी सदैव निन्दा करता है। जैसे जंगली भीलनी हाथी के गंडस्थल से प्राप्त मोती को छोड़कर गुंजाफल की माला को पहनती है॥8॥ यहां आचार्य चाणक्य के कहने का आशय यह है कि पारखी ही किसी वस्तु के महत्त्व को समझ सकता है। जैसे जंगल में रहने वाली भीलनी हाथी के मस्तक से प्राप्त होने वाले बहुमूल्य काले मोती को छोड़कर लाल रत्तियों की माला पहनती है क्योंकि वह उस मोती के महत्त्व को नहीं जानती। इसी प्रकार हर कोई गुणों को नहीं जान पाता। जौहरी ही रत्नों की पहचान करता है। 121

यस्तु संवत्सरं पूर्णं नित्यं मौनेन भुंजति। युगकोटिसहस्रं तुः स्वर्गलोके महीयते॥ जो कोई प्रतिदिन पूरे संवत्-भर मौन रहकर भोजन करते हैं, वे हजारों-करोड़ों युगों तक स्वर्ग में पूजे जाते हैं।।9।। भाव यह है कि जो व्यक्ति संतोष के साथ जो मिले उसी पर संतुष्ट रहता है, उसे पृथ्वी पर ही स्वर्ग का सुख प्राप्त होता है। उसे न तो कोई दुख होता है और न ही कोई कष्ट। आचार्य चाणक्य का कहने का तात्पर्य यह है कि भोजन प्रसन्नमुख तथा शांतभाव से करना चाहिए। कामं क्रोधं तथा लोभं स्वादं श्रृंगारकौतुके। अतिनिद्राऽतिसेवे च विद्यार्थी ह्यष्ट वर्जयेत्॥ काम (व्यभिचार), क्रोध (अभीष्ट की प्राप्ति न होने पर आपे से बाहर होना), लालच (धन-प्राप्ति की लालसा), स्वाद (जिह्वा को प्रिय लगने वाले पदार्थों का सेवन) श्रृंगार (सजना-धजना), खेल और अत्यधिक सेवा (दूसरों की चाकरी) आदि दुर्गुण विद्यार्थी के लिए वर्जित हैं। विद्यार्थी को इन आठों दुर्गुणों का सर्वथा त्याग कर देना चाहिए।। 10।। कहने का आशय यह है कि ये अवगुण विद्यार्थी को कभी भी अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंचने देते, अर्थात विद्यार्थी को चाहिए किं वे इन आठों प्रकार के अवगुणों का पूरी तरह त्याग करें। अकृष्टफलमूलेन वनवासरतः सदा। कुरुतेऽहरहः श्राद्धमृषिर्विप्रः स उच्यते॥ बिना जोते हुए स्थान के फल, मूल खाने वाला, अर्थात ईश्वर की कृपा से प्राप्त हर प्रकार के भोजन से संतुष्ट होने वाला, 122 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri

निरंतर वन से प्रेम रखने वाला और प्रतिदिन श्राद्ध करने वाला ब्राह्मण ऋषि कहलाता है॥11॥ भाव यह है कि जो संतुष्ट होकर भोजन करता है, गृहस्थी के मोह-बंधन में जो नहीं बंधा हुआ है और जो प्रतिदिन अपने पूर्वजों को याद करता है, वह ऋषि-मुनियों के ही समान तपस्वी है। एकाहारेण संतुष्टः षट्कर्मनिरतः सदा। ऋतुकालाभिगामी च स विप्रो द्विज उच्यते॥ जो व्यक्ति एक बार के भोजन से संतुष्ट हो जाता है, छः कर्मों (यज्ञ करना, यज्ञ कराना, पढ़ना, पढ़ाना, दान देना, दान लेना) में लगा रहता है और अपनी स्त्री से ऋतुकाल (मासिक धर्म) के बाद ही प्रसंग करता है, वही ब्राह्मण कहलाने का सच्चा अधि कारी है॥12॥ आचार्य चाणक्य के उपरोक्त श्लोक के संदर्भ में ऋतु कालगामी होने की व्याख्या इस प्रकार है—स्त्रियों का स्वाभाविक ऋतुकाल सोलह रात्रि का है। उसमें से चार रात्रि अर्थात रजोदर्शन से लेकर चार दिन निंदित हैं। ग्यारहवीं और तेरहवीं रात्रि भी निंदित हैं। शेष दस रात्रियां ऋतु दान में श्रेष्ठ हैं। जो संतान प्राप्ति के लिए ऐसी दस रात्रियों में समागम करता है वह ऋतुकालगामी कहलाता है। लौकिके कर्मणि रतः पशूनां परिपालकः। वाणिज्यकृषिकर्ता यः स विप्रो वैश्य उच्यते॥ जो ब्राह्मण दुनियादारी के कामों में लगा रहता है, पशुओं का पालन करने वाला और व्यापार तथा खेती करता है, वह वैश्य (वणिक) कहलाता है॥13॥ यहां आचार्य चाणक्य के कहने का आशय यह है कि जन्म से कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र नहीं होता। 123