भारतकोश
सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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पृष्ठ 120

॥ अथ एकादश अध्याय ॥ दातृत्वं प्रियवक्तृत्वं धीरत्वमुचितज्ञता। अभ्यासेन न लभ्यन्ते चत्वारः सहजा गुणाः॥ दान देने का स्वभाव, मधुर वाणी, धैर्य और उचित की पहचान, ये चार बातें अभ्यास से नहीं आतीं, ये मनुष्य के स्वाभाविक गुण हैं। ईश्वर के द्वारा ही ये गुण प्राप्त होते हैं। जो व्यक्ति इन गुणों का उपयोग नहीं करता, वह ईश्वर के द्वारा दिए गए वरदान की उपेक्षा ही करता है और दुर्गुणों को अपनाकर घोर कष्ट भोगता है॥1॥ आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक के माध्यम से बताया है कि निरंतर अभ्यास से मनुष्य अनेक गुणों को प्राप्त कर सकता है, परंतु अभ्यास से सबकुछ प्राप्त नहीं हो सकता। कुछ गुण ऐसे होते हैं जो स्वाभाविक होते हैं। उनका वर्णन श्लोक में किया गया है। आत्मवर्गं परित्यज्य परवर्गं समाश्रयेत्। स्वयमेव लयं याति यथा राजाऽन्यधर्मतः॥ जो अपने वर्ग को छोड़कर दूसरे के वर्ग का आश्रय ग्रहण करता है, वह स्वयं ही नष्ट हो जाता है, जैसे राजा अधर्म के द्वारा नष्ट 118 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri