सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहो जाता है। उसके पाप कर्म उसे नष्ट कर डालते हैं॥2॥ वस्तुतः जो व्यक्ति अपनों का न हुआ, वह दूसरों का कैसे हो सकता है ? अपनों को त्यागना ही अधर्म के मार्ग पर चलना है, जिससे अन्ततः हानि ही होती है। हस्ती स्थूलतनुः स चांकुशवशः किं हस्तिमात्रोऽङ्कुशः दीपे प्रज्वलिते प्रणश्यति तमः किं दीपमात्रं तमः। वज्रेणापि हताः पतन्ति गिरयः किं वज्रमात्रं गिरिस् तेजो यस्य विराजते सः बलवान् स्थूलेषु कः प्रत्ययः॥ हाथी मोटे शरीर वाला है, परंतु अंकुश से वश में रहता है। क्या अंकुश हाथी के बराबर है? दीपक के जलने पर अंधकार नष्ट हो जाता है। क्या दीपक अंधकार के बराबर है? वज्र से बड़े-बड़े पर्वत शिखर टूटकर गिर जाते हैं। क्या वज्र पर्वतों के समान है? सत्यता यह है कि जिसका तेज चमकता रहता है, वही बलवान है। मोटेपन से बल का अहसास नहीं होता॥3॥ भाव यह है कि किसी के आकार को देखकर उसकी शक्ति का अनुमान नहीं लगा लेना चाहिए। शक्ति साहस में होती है। कलौ दशसहस्रेषु हरिस्त्यजति मेदिनीम्। तदर्द्धं जाह्नवीतोयं तदर्द्धं ग्रामदेवता॥ कलियुग के दस हजार वर्ष बीतने पर श्रीविष्णु (पालनकर्ता) इस पृथ्वी को छोड़ देते हैं, उसके आधा बीतने पर गंगा का जल समाप्त हो जाता है और उसके आधा बीतने पर ग्राम के देवता भी पृथ्वी को छोड़ देते हैं॥4॥ भाव यह है कि कलियुग के दस हजार वर्ष बीतने के बाद इस धरती से जीवन-यापन के सभी समुचित साधन नष्ट हो 119 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri