भारतकोश
सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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जाएंगे और दस हजार के आधे अर्थात् अगले पांच हजार वर्ष बीतने पर पापों का नाश करके मन को पवित्र करने वाली गंगा का जल भी समाप्त हो जाएगा और फिर उसके आधे अर्थात् अगले ढाई हजार साल बीतने पर धरती की कृषि-भूमि भी नष्ट हो जाएगी। इसका अर्थ यह है कि कलियुग के साढ़े सत्रह हजार वर्ष बीत जाने पर पुनः प्रलय होगी और यह धरती जल में डूब जाएगी। गृहाऽऽसक्तस्य नो विद्या नो दया मांसभोजिनः। द्रव्यलुब्धस्य नो सत्यं स्त्रैणस्य न पवित्रता॥ घर-गृहस्थी में आसक्त व्यक्ति को विद्या नहीं आती। मांस खाने वाले को दया नहीं आती। धन के लालची को सच बोलना नहीं आता और स्त्री में आसक्त कामुक व्यक्ति में पवित्रता नहीं होती॥5॥ विद्या प्राप्ति के लिए गृह-त्याग करके गुरु के पास जाना जरूरी है। मांसाहारी व्यक्ति दया भूल जाता है। लालची व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए बार-बार झूठ का सहारा लेता है और कामुक व्यक्ति सदा स्त्री-सम्भोग में लिप्त रहता है, तब वह पवित्र कैसे हो सकता है। न दुर्जनः साधुदशामुपैति बहुप्रकारैरपि शिक्ष्यमाणः। आमूलसिक्तः पयसा घृतेन न निम्बवृक्षो मधुरत्वमेति॥ जिस प्रकार नीम के वृक्ष की जड़ को दूध और घी से सींचने के उपरांत भी वह अपनी कड़वाहट छोड़कर मृदुल नहीं हो जाता, ठीक इसी के अनुरूप दुष्ट प्रवृत्तियों वाले मनुष्यों पर सदुपदेशों का कोई भी असर नहीं होता॥6॥ कहने का आशय यह है कि दुष्ट मनुष्य की आदत बन चुके अवगुणों को बदला नहीं जा सकता। 120 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri