सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअंतर्गतमलो दुष्टस्तीर्थस्नानशतैरपि। न शुध्यति यथा भाण्डं सुराया दाहितं च सत्॥ जिस प्रकार शराब वाला पात्र अग्नि में तपाए जाने पर भी शुद्ध नहीं हो सकता, उसी प्रकार जिस मनुष्य के हृदय में पाप और कुटिलता भरी होती है, सैकड़ों तीर्थ स्थानों पर स्नान करने से भी ऐसे मनुष्य पवित्र नहीं हो सकते॥7॥ भाव यही है कि जब तक मनुष्य अपने मन की मलिनता अर्थात् पाप में प्रवृत्त होने की भावना का त्याग नहीं करता, तब तक उसके तीर्थ-स्नान करने से भी कोई लाभ नहीं है। वह पापी ही बना रहता है। वह सैकड़ों तीर्थ-स्नानों पर स्नान करने से भी पवित्र नहीं हो पाता। न वेत्ति यो यस्यगुणप्रकर्षं स तं सदा निन्दति नाऽत्र चित्रम्। यथा किराती करिकुम्भजाता मुक्तां परित्यज्य बिभर्ति गुंजाः॥ इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि जो जिसके गुणों के महत्त्व को नहीं जानता, वह उसकी सदैव निन्दा करता है। जैसे जंगली भीलनी हाथी के गंडस्थल से प्राप्त मोती को छोड़कर गुंजाफल की माला को पहनती है॥8॥ यहां आचार्य चाणक्य के कहने का आशय यह है कि पारखी ही किसी वस्तु के महत्त्व को समझ सकता है। जैसे जंगल में रहने वाली भीलनी हाथी के मस्तक से प्राप्त होने वाले बहुमूल्य काले मोती को छोड़कर लाल रत्तियों की माला पहनती है क्योंकि वह उस मोती के महत्त्व को नहीं जानती। इसी प्रकार हर कोई गुणों को नहीं जान पाता। जौहरी ही रत्नों की पहचान करता है। 121