सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयस्तु संवत्सरं पूर्णं नित्यं मौनेन भुंजति। युगकोटिसहस्रं तुः स्वर्गलोके महीयते॥ जो कोई प्रतिदिन पूरे संवत्-भर मौन रहकर भोजन करते हैं, वे हजारों-करोड़ों युगों तक स्वर्ग में पूजे जाते हैं।।9।। भाव यह है कि जो व्यक्ति संतोष के साथ जो मिले उसी पर संतुष्ट रहता है, उसे पृथ्वी पर ही स्वर्ग का सुख प्राप्त होता है। उसे न तो कोई दुख होता है और न ही कोई कष्ट। आचार्य चाणक्य का कहने का तात्पर्य यह है कि भोजन प्रसन्नमुख तथा शांतभाव से करना चाहिए। कामं क्रोधं तथा लोभं स्वादं श्रृंगारकौतुके। अतिनिद्राऽतिसेवे च विद्यार्थी ह्यष्ट वर्जयेत्॥ काम (व्यभिचार), क्रोध (अभीष्ट की प्राप्ति न होने पर आपे से बाहर होना), लालच (धन-प्राप्ति की लालसा), स्वाद (जिह्वा को प्रिय लगने वाले पदार्थों का सेवन) श्रृंगार (सजना-धजना), खेल और अत्यधिक सेवा (दूसरों की चाकरी) आदि दुर्गुण विद्यार्थी के लिए वर्जित हैं। विद्यार्थी को इन आठों दुर्गुणों का सर्वथा त्याग कर देना चाहिए।। 10।। कहने का आशय यह है कि ये अवगुण विद्यार्थी को कभी भी अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंचने देते, अर्थात विद्यार्थी को चाहिए किं वे इन आठों प्रकार के अवगुणों का पूरी तरह त्याग करें। अकृष्टफलमूलेन वनवासरतः सदा। कुरुतेऽहरहः श्राद्धमृषिर्विप्रः स उच्यते॥ बिना जोते हुए स्थान के फल, मूल खाने वाला, अर्थात ईश्वर की कृपा से प्राप्त हर प्रकार के भोजन से संतुष्ट होने वाला, 122 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri