सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
पृष्ठ 142, कुल 196 में से
संदर्भ में पढ़ेंअर्थात मोह हो जाता है, उसके न रहने की शंका से ही उसे भय होने लगता है और यह भय उसे दुःख पहुंचाने वाला होता है। मोह ही सारे कष्टों का जड़ है इसलिए लगाव अर्थात मोह को त्याग देना ही उत्तम है। अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिस्तथा। द्वावेते सुखमेधेते यद्भविष्यो विनश्यति॥ भविष्य में आने वाली सम्भावित विपत्ति और वर्तमान में उपस्थित विपत्ति पर जो तत्काल विचार करके उसका समाधान खोज लेते हैं, वे सदा सुखी रहते हैं। इसके अलावा जो ऐसा सोचते रहते हैं कि 'यह होगा, वैसा होगा तथा जो होगा, देखा जाएगा' और कुछ उपाय नहीं करते, वे शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं॥6॥ प्रस्तुत श्लोक में आचार्य चाणक्य ने कर्म करने और मात्र भगवान के भरोसे न बैठने रहने की बात कही है। उनके कहने का भाव यह है कि केवल भाग्य के भरोसे ही नहीं बैठे रहना चाहिए। विपत्ति आने पर या उसके आने की संभावना होने पर तत्काल उपाय कर लेने चाहिए। जो व्यक्ति विपत्ति को भगवान की ओर से रचा गया भाग्य कहकर उसे समाप्त करने का उपाय नहीं करते, वे अंततः नष्ट हो जाते हैं। राज्ञि धर्मिणि धर्मष्ठाः पापे पापाः समे समाः। राजानमनुवर्तन्ते यथा राजा तथा प्रजाः॥ जैसा राजा होता है, उसकी प्रजा भी वैसी ही होती है। धर्मात्मा राजा के राज्य की प्रजा धर्मात्मा, पापी के राज्य की पापी और मध्यम वर्गीय राजा के राज्य की प्रजा मध्यम अर्थात राजा का अनुसरण करने वाली होती है॥7॥ आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक के माध्यम से ज्ञान दिया है कि यदि राजा दुर्बल, शासन चलाने में असमर्थ, 140 CC0 Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri