सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
पृष्ठ 143, कुल 196 में से
संदर्भ में पढ़ेंपापाचारी, शासन तंत्र चलाने में अक्षम है तो शासक वर्ग को प्रजा को लूटने का अच्छा अवसर मिल जाता है। जीवन्तं मृतवन्मन्ये देहिनं धर्मवर्जितम्। मृतो धर्मेण संयुक्तो दीर्घजीवी न संशयः॥ धर्म से विमुख व्यक्ति जीवित भी मृतक के समान है, परंतु धर्म का आचरण करने वाला व्यक्ति चिरंजीवी होता है॥8॥ भाव यह है कि धर्म का आचरण करने से मनुष्य के सदाचरण युग-युग तक लोगों की जुबान पर रहते हैं और वह व्यक्ति सशरीर न होने पर भी लोगों के दिलों में जीवित रहता है। इसमें संशय नहीं करना चाहिए। धर्मार्थकाममोक्षाणां यस्यैकोऽपि न विद्यते। अजागलस्तनस्येव तस्य जन्म निरर्थकम्॥ धर्म, धन, काम, मोक्ष, इनमें से जिसने एक को भी नहीं पाया, उसका जीवन व्यर्थ है॥9॥ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों का संबंध इस लोक और परलोक, दोनों से है। मनुष्य को अपना जीवन सार्थक करने के लिए इनमें से किसी एक को तो अवश्य ही पाना चाहिए। दह्यमानाः सुतीव्रेण नीचाः परयशोऽग्निना। अशक्तास्तत्पदं गन्तुं ततो निन्दां प्रकुर्वते॥ नीच मनुष्य दूसरों की यशस्वी अग्नि की तेजी से जलते हैं और उस स्थान पर (उस यश को पाने के स्थान पर) न पहुंचने के कारण उनकी निन्दा करते हैं॥10॥ दूसरों की निन्दा सदैव दुष्ट व्यक्ति ही किया करते हैं। वे दूसरों के यश को देखकर सदैव ईर्ष्या से जलते रहते हैं। 141 CC0- Vasisntha Tripathi Collection, Digitized by eGangotri