सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥अथ त्रयोदश अध्याय ॥ मुहूर्तंमपि जीवेच्च नरः शुक्लेन कर्मणा। न कल्पमपि कष्टेन लोकद्वयविरोधिना॥ उत्तम कर्म करते हुए एक पल का जीवन भी श्रेष्ठ है, परंतु दोनों लोकों (लोक-परलोक) में दुष्कर्म करते हुए कल्प भर का जीवन (हजारों वर्षों का जीना) भी श्रेष्ठ नहीं है॥1॥ भाव यही है कि मनुष्य को जितना भी जीवन मिला है, उसे श्रेष्ठ कर्मों में ही लगाना उचित है। गते शोको न कर्तव्यो भविष्यं नैव चिन्तयेत्। वर्तमानेन कालेन प्रवर्तन्ते विचक्षणाः॥ बीते हुए का शोक नहीं करना चाहिए और भविष्य में जो कुछ होने वाला है, उसकी चिन्ता नहीं करनी चाहिए। आए हुए समय को देखकर ही विद्वान लोग किसी कार्य में लगते हैं॥2॥ इस प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति वही है जो वर्तमान के संबंध में ही सोच-विचारकर कार्य करता है, अर्थात जो वर्तमान में जीता है, भूत और भविष्य की चिन्ता नहीं करता। 138