सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधन को ढेले (कंकड़) के समान और सभी जीवों को अपने समान देखता है, वही पंडित है, विद्वान है।। 14।। दूसरे की स्त्री का मोह और दूसरे के धन का लालच बहुत प्रबल होता है, परंतु जो उनमें आसक्त न होकर परोपकार करता है, सभी जीवों को अपना समझता है, वास्तव में वही विद्वान है। धर्मे तत्परता मुखे मधुरता दाने समुत्साहता, मित्रेऽवंचकता गुरौ विनयता चित्तेऽतिगंभीरता। आचारे शुचिता गुणे रसिकता शास्त्रेषु विज्ञानता, रूपे सुन्दरता शिवे भजनता स्वभ्यस्ति भो राघवः॥ महर्षि वशिष्ठ राम से कहते हैं—'हे राम! धर्म के निर्वाह में सदैव तत्पर रहने, मधुर वचनों का प्रयोग करने, दान में रुचि, मित्र से निश्छल व्यवहार करने, गुरु के प्रति सदैव विनम्रता रखने, चित्त में अत्यन्त गंभीरता को बनाए रखने, ओछेपन को त्यागने, आचार-विचार में पवित्रता रखने, गुण ग्रहण करने के प्रति सदैव आग्रह रखने, शास्त्रों में निपुणता प्राप्त करने तथा शिव के प्रति सदा भक्ति-भाव रखने के गुण केवल तुम्हारे भीतर ही दिखलाई पड़ते हैं इसीलिए लोग तुम्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहते हैं।'।। 15।। आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक में सज्जनता की सही पहचान बताई है। परमेश्वर (ईश्वर) की भक्ति तथा अन्य अच्छी बातें और संस्कार सज्जनों में दृष्टिगोचर होने चाहिए। काष्ठं कल्पतरुः सुमेरुचलश्चिन्तामणिः प्रस्तरः सूर्यस्तीव्रकरः शशी क्षयकरः क्षारो हि वारां निधिः। कामो नष्टतनुर्बलिर्दितिसुतो नित्यं पशुः कामगौः, नैतास्ते तुलयामि भो रघुपते! कस्योपमा दीयते॥ हे रघुपति ! राम! कल्पवृक्ष काष्ठ है, सुमेरू पर्वत है, 134 CC0. Vashishtha Tripathi Collection Digitized by eGangotri