सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचलायमान हैं और मृत्यु निकट है। ऐसे में मनुष्य को सदैव धर्म का संचय करना चाहिए। इस प्रकार यह संसार नश्वर है। केवल सद्कर्म ही नित्य और स्थायी हैं। हमें इन्हीं को अपने जीवन का अंग बनाना चाहिए।। 12 ।। आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक में धर्म आचरण की महत्ता का वर्णन किया है। शरीर नाशवान है, धन-संपत्ति भी सदा रहने वाली नहीं है, मौत सदा सिरहाने खड़ी है, अतः धर्म का संचय, धर्माचरण करना चाहिए। आमन्त्रणोत्सवा विप्रा गावो नवतृणोत्सवाः। पत्युत्साहयुता नार्याः अहं कृष्ण-रणोत्सवः ॥ निमन्त्रण पाकर ब्राह्मण प्रसन्न होते हैं, जैसे हरी घास देखकर गौओं के लिए उत्सव अर्थात प्रसन्नता का माहौल बन जाता है। ऐसे ही पति के प्रसन्न होने पर स्त्री के लिए घर में उत्सव का-सा दृश्य उपस्थित हो जाता है, परंतु मेरे लिए भीषण रण में अनुराग रखना उत्सव के समान है। मेरे लिए युद्धरत होना जीवन की सार्थकता है।। 13 ।। आचार्य चाणक्य प्रस्तुत श्लोक में अपने लिए कहते हैं कि मेरे लिए तो भयंकर मार-काट वाला युद्ध ही उत्सव है। भोजन के लिए निमंत्रण मिलना ब्राह्मणों के लिए उत्सव समान। चरने के लिए नई घास गौओं के लिए। पति का उत्साह से युक्त रहना स्त्रियों के लिए और चाणक्य के लिए भयंकर मार-काट वाला युद्ध ही उत्सव के समान है। मातृवत् परदारेषु परद्रव्याणि लोष्ठवत्। आत्मवत् सर्वभूतानि यः पश्यति सः पण्डितः ॥ जो व्यक्ति दूसरे की स्त्री को माता के समान, दूसरे के 133 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri