सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुनने के विरोधी, दोनों नेत्र महात्माओं के दर्शन से वंचित, दोनों पैर तीर्थयात्रा से दूर और केवल अन्याय के द्वारा कमाए धन से पेट भरकर अंहकार करने वाले, हे रंगे सियार! निन्दा के योग्य इस नीच शरीर को छोड़ दे॥4॥ जो व्यक्ति दया, दान, धर्म से वंचित होकर गलत तरीके से कमाए धन पर अहंकार करके इतराता है, वह नीच है। ऐसे व्यक्ति को अपने शरीर से मोह नहीं करना चाहिए। भाव यह है कि मनुष्य को इस शरीर से अच्छे कर्म करने चाहिए। येषां श्रीमद्यशोदासुत-पद-कमले नास्ति भक्तिर्नराणाम्, येषामाभीरकन्या प्रियगुणकथने नानुरक्ता रसज्ञा। तेषां श्रीकृष्णलीला ललितरसकथा सादरौ नैव कर्णौ, धिक्तान् धिक्तान् धिगेतान्, कथयति सततं कीर्तनस्था मृदंग॥ जिनकी भक्ति यशोदा के पुत्र (श्रीकृष्ण) के चरणकमलों में नहीं है, जिनकी जिह्वा अहीरों की कन्याओं (गोपियों) के प्रिय (श्री गोविन्द) के गुणगान नहीं करती, जिनके कान परमानन्द स्वरूप श्रीकृष्णचन्द्र की लीला तथा मधुर रसमयी कथा को आदरपूर्वक सुनने में नहीं हैं, ऐसे लोगों को मृदंग की थाप, धिक्कार है, धिक्कार है (धिक्तान्-धक्तान्) कहती है॥5॥ प्रस्तुत श्लोक में आचार्य चाणक्य ने मृदंग वाद्य की ध्वनि से बहुत अच्छी उपमा दी है। मृदंग से आवाज निकलती है 'धिक्तान्' इसका संस्कृत में अर्थ है 'उन्हें धिक्कार है'। इसके आगे कवि कल्पना करता है कि जिन लोगों का भगवान श्रीकृष्ण के चरणकमलों में अनुराग नहीं, जिनकी जिह्वा को श्री राधाजी और गोपियों के गुणगान में आनंद नहीं आता, जिनके कान श्रीकृष्ण की सुंदर कथा को सुनने के लिए सदा उत्सुक नहीं रहते, मृदंग भी उन्हें 'धिक्कार है, धिक्कार है' कहता है। वस्तुतः जो 129 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri