सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्यक्ति जीवन में प्रभु का गुणगान नहीं करता, उसे धि क्कार है, उसका जीवन व्यर्थ है। पत्रं नैव यदा करीलविटपे दोषो वसन्तस्य किं ? नोलूकोऽप्यवलोकते यदि दिवा सूर्यस्य किं दूषणम्। वर्षा नैव पतन्ति चातकमुखे मेघस्य किं दूषणम्? यत्पूर्व विधिना ललाटलिखितं तन्मार्जितुं कः क्षमः॥ वसंत ऋतु में यदि करील के वृक्ष पर पत्ते नहीं आते तो इसमें वसंत का क्या दोष है? सूर्य सबको प्रकाश देता है, पर यदि दिन में उल्लू को दिखाई नहीं देता तो इसमें सूर्य का क्या दोष है? इसी प्रकार वर्षा का जल यदि चातक के मुंह में नहीं पड़ता तो इसमें मेघों का क्या दोष है? इसका अर्थ यही है कि ब्रह्मा ने भाग्य में जो लिख दिया है, उसे कौन मिटा सकता है?॥6॥ यहां आचार्य चाणक्य के कहने का आशय यह है कि भाग्य प्रबल है, अटल है। उसके लिखे को कोई नहीं मिटा सकता। सत्संगाद् भवति हि साधुता खलानां, साधूनां न हि खलसंगयात् खलत्वम्। आमोदं कुसुम - भवं मृदेव धत्ते, मृद्गन्धं न हि कुसुमानि धारयन्ति॥ अच्छी संगति से दुष्टों में भी साधुता आ जाती है। उत्तम लोग दुष्ट के साथ रहने के बाद भी नीच नहीं होते। फूल की सुगंध को मिट्टी तो ग्रहण कर लेती है, पर मिट्टी की गंध को फूल ग्रहण नहीं करता॥7॥ भाव यह है कि जिस प्रकार मिट्टी फूल की खुशबू तो ग्रहण कर लेती है परंतु मिटी की गंध को फूल ग्रहण नहीं करते 130 CC0. Vashistha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri