सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअतिथि का आदर, परमात्मा की उपासना, श्रेष्ठ पुरुषों का सत्संग होता रहे, ऐसा घर धन्य और प्रशंसनीय है। आर्तेषु विप्रेषु दयान्वितश्च यत् श्रद्धया स्वल्पमुपैति दानम्। अनन्तपारं समुपैति राजन् यद्दीयते तन्न लभेद् द्विजेभ्यः॥ जो व्यक्ति दुःखी ब्राह्मणों पर दयामय होकर अपने मन से दान देता है, वह अनन्त होता है। हे राजन! ब्राह्मणों को जितना दान दिया जाता है, वह उतने से कई गुना अधिक होकर वापस मिलता है॥२॥ भाव यह है कि यजमान को उदारतापूर्वक दान देना चाहिए। दाक्षिण्यं स्वजने दया परिजने शठ्यं सदा दुर्जने, प्रीतिः साधुजने स्मयः खलजने विद्वज्जने चार्जवम् शौर्यं शत्रुजने क्षमा गुरुजने नारीजने धृष्टता, इत्थं ये पुरुषाः कलासु कुशलास्तेष्वेव लोकस्थितः॥ जो पुरुष अपने वर्ग में उदारता, दूसरे के वर्ग पर दया, दुर्जनों के वर्ग में दुष्टता, उत्तम पुरुषों के वर्ग में प्रेम, दुष्टों से सावधानी, पंडित वर्ग में कोमलता, शत्रुओं में वीरता, अपने बुजुर्गों के बीच में सहनशक्ति, स्त्री वर्ग में धूर्तता आदि कलाओं में चतुर हैं, ऐसे ही लोगों से इस संसार की मर्यादा बंधी हुई है॥३॥ स्थान और समय के अनुसार जो कार्य करता है, वह चतुर है। हस्तौ दानविवर्जितौ श्रुतिपुटौ सारस्वतद्रोहिणौ, नेत्रे साधुविलोकनेन रहिते पादौ न तीर्थ गतौ। अन्यायार्जितवित्तपूर्णमुदरं गर्वेण तुंगं शिरो, रे रे जम्बुक! मुंच मुंच सहसा नीचं सुनिन्द्यं वपुः॥ दोनों हाथ दान देने से रहित, दोनों काल वेदशास्त्रों को 128