सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्भय होकर तोड़ने वाला ब्राह्मण म्लेच्छ (नीच) कहलाता है।।16।। आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक के द्वारा भी ब्राह्मण कर्तव्य का बोध कराया है। अपने वास्तविक कर्तव्य से विमुख होकर जो ब्राह्मण आक्रांताओं ( हमलावरों) जैसा तोड़-फोड़ का कार्य करता है, वह ब्राह्मण न रहकर स्वयं भी म्लेच्छ हो जाता है। देवद्रव्यं गुरुद्रव्यं परदाराऽभिमर्शनम्। निर्वाहः सर्वभूतेषु विप्रश्चाण्डाल उच्यते॥ देवता का धन, गुरु का धन, दूसरे की स्त्री के साथ प्रसंग (संभोग) करने वाला और सभी जीवों में निर्वाह करने अर्थात सबका अन्न खाने वाला ब्राह्मण चांडाल कहलाता है।।17।। इन दिनों पूजा-स्थलों की आय को भी कुछ लोग हड़प कर जाते हैं। वे किसी चाण्डाल से कम नहीं होते। देयं भोज्यधनं सदा सुकृतिभिर्नो संतिव्यं कदा, श्रीकर्णस्य बलेश्र्च विक्रमपतेरद्यापि कीर्तिः स्थिता। अस्माकं मधु दानभोगरहितं नष्टं चिरात् संचितम्, निर्वाणादिति पाणिपादयुगलं घर्षन्त्यहो मक्षिकाः॥ भाग्यशाली पुण्यात्मा लोगों को खाद्य-सामग्री और धन-धान्य आदि का संग्रह न करके, उसे अच्छी प्रकार से दान करना चाहिए। दान देने से कर्ण, दैत्यराज बलि और विक्रमादित्य जैसे राजाओं की कीर्ति आज तक बनी हुई है। इसके विपरीत शहद का संग्रह करने वाली मधुमक्खियां जब अपने द्वारा संग्रहीत मधु को किसी कारण से नष्ट हुआ देखती हैं तो वे अपने पैरों को रगड़ते हुए कहती हैं कि हमने न तो अपने मधु का उपयोग किया और न किसी को दिया ही।।18।। 125 CC0 Vasisththa Tripathi Collection Digitized by eGangotri