सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ अथ सप्तदश अध्याय ॥ पुस्तकप्रत्ययाधीतं नाधीतं गुरुसन्निधौ। सभामध्ये न शोभन्ते जारगर्भा इव स्त्रियः॥ जिस प्रकार पर-पुरुष से गर्भ धारण करने वाली स्त्री समाज में शोभा नहीं पाती, उसी प्रकार गुरु के चरणों में बैठकर विद्या प्राप्त न करके इधर-उधर से पुस्तकें पढ़कर जो ज्ञान प्राप्त करते हैं, वे विद्वानों की सभा में शोभा नहीं पाते क्योंकि उनका ज्ञान अधूरा होता है। उसमें परिपक्वता नहीं होती। अधूरे ज्ञान के कारण वे शीघ्र ही उपहास के पात्र बन जाते हैं।।1।। आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक के माध्यम से बताया है कि पुस्तक से पढ़कर शुद्ध उच्चारण नहीं सीखा जा सकता। इसी प्रकार व्यभिचार कर्म से गर्भधारण किया गया शिशु पिता का नाम नहीं पा सकता। कृते प्रतिकृतं कुर्याद्धिंसने प्रतिहिंसनम्। तंत्र दोषो न पतति दुष्टे दुष्टं समाचरेत्॥ उपकार का बदला उपकार से देना चाहिए और हिंसा वाले के साथ हिंसा करनी चाहिए। वहां दोष नहीं लगता 172 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri