भारतकोश
सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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क्योंकि दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार करना ही ठीक रहता है॥2॥ आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक में कहा है कि यूं तो सबके साथ प्रीतिपूर्वक व्यवहार करना चाहिए पर दुष्ट के साथ प्रीतिपूर्वक व्यवहार करना उसकी दुष्टता को बढ़ावा देना होता है। यद्दूरं यद्दुराध्यं यच्च दूरे व्यवस्थितम्। तत्सर्वं तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम्॥ तप में असीम शक्ति है। तप के द्वारा सभी कुछ प्राप्त किया जा सकता है। जो दूर है, बहुत अधिक दूर है, जो बहुत कठिनता से प्राप्त होने वाला है और बहुत दूरी पर स्थित है, ऐसे साध्य को तपस्या के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। तप के द्वारा तो ईश्वर को भी प्राप्त किया जा सकता है। अतः जीवन में साधना का विशेष महत्त्व है। इसके द्वारा ही मनोवांछित सिद्धि प्राप्त की जा सकती है॥3॥ आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक में बताया है कि तप से कठिन-से-कठिन कार्य सहज बन जाते हैं। तप से मृत्यु पर विजय पाई जा सकती है। तप का अर्थ है विपत्तियां आने पर भी धर्म को न छोड़ना। लोभश्चेदगुणेन किं पिशुनता यद्यस्ति किं पातकैः, सत्यं चेत्तपसा च किं शुचि मनो यद्यस्ति तीर्थेन किम्। सौजन्यं यदि किं गुणैः सुमहिमा यद्यस्ति किं मण्डनैः, सद्विद्या यदि किं धनैरपयशो यद्यस्ति किं मृत्युना॥ लोभ सबसे बड़ा अवगुण है, पर निन्दा सबसे बड़ा पाप है, सत्य सबसे बड़ा तप है और मन की पवित्रता सभी तीर्थों में जाने 173