सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपत्युराज्ञां विना नारी ह्युपोष्य व्रतचारिणी। आयुष्यं हरते भर्तुः सा नारी नरकं व्रजेत्॥ पति की आज्ञा के बिना जो स्त्री उपवास और व्रत करती है, वह अपने पति की आयु को कम करने वाली होती है, अर्थात पति को नष्ट करके सीधे नर्क में जाती है॥१॥ अतः पति की आज्ञा लेकर ही व्रत-उपवास आदि करने चाहिए, तभी इन कर्मों का उत्तम फल प्राप्त होता है। न दानैः शुद्ध्यते नारी नोपवासशतैरपि। न तीर्थसेवया तद्वद् भर्तुः पादोदकैर्यथा॥ स्त्री न तो दान से, न सैकड़ों उपवास-व्रतों से, न तीर्थाटन करने से उस प्रकार से शुद्ध हो पाती है, जैसे वह अपने पति के चरण-जल से शुद्ध होती है॥10॥ अतः पति की चरण-सेवा ही स्त्री के कल्याण के लिए उत्तम है। उसका पति ही उसके लिए परमेश्वर है। पाद्यशेषं पीतशेषं सन्ध्याशेषं तथैव च। श्वानमूत्रसमं तोयं पीत्वा चान्द्रायणं चरेत्॥ पैरों के धोने से बचा हुआ, पीने के बाद पात्र में बचा हुआ और सन्ध्या से बचा हुआ जल कुत्ते के मूत्र के समान है। उसे पीने के बाद ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य चन्द्रायण व्रत को करें, तभी वे पवित्र हो सकते हैं॥11॥ आचार्य चाणक्य कहते हैं कि किसी भी कार्य से बचे हुए जल को नहीं पीना चाहिए। वह जल अशुद्ध माना जाता है। उनका मानना है कि पैरों के धोने के बाद बचा हुआ जल, पीने के बाद बचा हुआ जल तथा सन्ध्या से बचे हुए जल को जो व्यक्ति पीता है वह चन्द्रायण व्रत करने के उपरान्त 176 सम्पूर्ण चाणक्य नीति-11