सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलेता है। परिस्थितियों से घबराकर मुंह मोड़ लेना कायर मनुष्य का काम है। व्यक्ति को तो चाहिए कि वह अपना कार्य पूरे मनोयोग से करे। सच्चे अर्थों में वही धर्म भी है। नाऽन्नोदकसमं दानं न तिथिर्द्वादशी समा। न गायत्र्याः परो मंत्रो न मातुपरं दैवतम्॥ अन्नदान व जलदान से बड़ा कोई अन्य दान नहीं, द्वादशी तिथि के समान कोई अन्य तिथि नहीं, गायत्री मंत्र के समान कोई अन्य मंत्र नहीं और माता के समान कोई दूसरा देवता नहीं॥7॥ द्वादशी तिथि पर किए गए पुण्य कर्मों का फल उत्तम होता है, गायत्री मंत्र श्रेष्ठ फल देने वाला है और मां का आशीर्वाद सभी इच्छाओं की पूर्ति करने वाला है। मां के दूध का ऋण उतारना असंभव है। आचार्य चाणक्य के इस कथन को ध्यान में रखकर चलने वाला मनुष्य सदैव अच्छा फल प्राप्त करता है। तक्षकस्य विषं दंते मक्षिकायास्तु मस्तके। वृश्चिकस्य विषं पुच्छे सर्वांगे दुर्जने विषम्॥ तक्षक (एक सांप का नाम) के दांत में विष होता है, मक्खी के सिर में विष होता है, बिच्छू की पूंछ में विष होता है, परन्तु दुष्ट व्यक्ति के पूरे शरीर अर्थात सारे अंगों में विष होता है॥8॥ भाव यह है कि दुर्जन व्यक्ति हर प्रकार से सज्जनों को कष्ट पहुंचाने वाला होता है। उसका साथ किसी रूप में भी सुखकर नहीं है। बुद्धिमान व्यक्ति सदैव ऐसे दुष्ट लोगों से बचकर चलते हैं क्योंकि दुर्जन व्यक्ति के तो सारे अंगों में विष भरा होता है। 175 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri