सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजानीयात् प्रेषणे भृत्यान् बान्धवान् व्यसनाऽऽगमे। मित्रं चाऽऽपत्तिक़ालेषु भार्यां च विभवक्षये॥ नौकरों को बाहर भेजने पर, भाई-बंधुओं को संकट के समय तथा दोस्त को विपत्ति में और अपनी स्त्री को धन के नष्ट हो जाने पर परखना चाहिए, अर्थात उनकी परीक्षा करनी चाहिए।।11।। चाणक्य ने समय-समय पर अपने सेवकों, भाई-बंधुओं, मित्रों और अपनी स्त्री की परीक्षा लेने की बात कही है, समय आने पर ये लोग आपका किस प्रकार साथ देंगें, इसकी जांच उनके कार्यों से होती है। वास्तव में इस संसार में मनुष्य का संपर्क अपने सेवकों, बंधु-बांधवों, मित्रों और सबसे निकट अपनी पत्नी से होता है। यदि ये लोग छल करने लगें तो जीवन दूभर हो जाता है, इसलिए समय-समय पर अपने मित्रों, सेवकों, बंधु-बांधवों व अपनी पत्नी की परीक्षा करके पहचान करना जरूरी हो जाता है कि वे उसे धोखा तो नहीं दे रहे हैं। इस संसार में मित्र और पत्नी से बड़ा सहायक कोई दूसरा नहीं होता, परंतु इनकी पहचान तभी हो पाती है जब संकट का समय उपस्थित होता है। आतुरे व्यसने प्राप्ते दुर्भिक्षे शत्रुसंकटे। राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः॥ बीमारी में, विपत्तिकाल में, अकाल के समय, दुश्मनों से दुःख पाने या आक्रमण होने पर, राजदरबार में और श्मशान-भूमि में जो साथ रहता है, वही सच्चा भाई अथवा बंधु है।।12।। आचार्य चाणक्य के अनुसार संसार में मनुष्य के बंधु-बांधव तो बहुत होते हैं, लेकिन सच्चे बंधु कम ही मिलते हैं। अक्सर देखा गया है कि कुछ लोग अपना उद्देश्य (स्वार्थ) पूरा