सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनहीं देना चाहते। यदि वे ऐसा करते भी हैं तो भीतर से उनका कोमल हृदय दुःखी होता है। माता-पिता और गुरु की मार-पिटाई के पीछे बच्चे का भविष्य छिपा होता है। यदि वे उसे अधिक लाड़-प्यार करें तो वह ढीठ होकर बिगड़ जाता है इसलिए उन्हें डांटना-फटकारना उनकी भलाई के लिए ही होता है। श्लोकेन वा तदर्धेन पादेनैकाक्षरेण वा। अबन्ध्यं दिवसं कुर्याद् दानाध्ययनकर्मभिः॥ एक श्लोक, आधा श्लोक, श्लोक का एक चरण, उसका आधा अथवा एक अक्षर ही सही या आधा अक्षर प्रतिदिन पढ़ना चाहिए॥13॥ आचार्य चाणक्य ने इस श्लोक के द्वारा शिक्षा के महत्त्व को दर्शाया है। उनका कहना है कि मानव-जीवन सभी जीवों में श्रेष्ठ है इसीलिए मनुष्य को अपना जीवन सफल बनाने के लिए अध्ययन, दूसरों की भलाई अथवा दान अवश्य करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा है कि जीवन का एक नियम बना लेना चाहिए कि प्रतिदिन चाहे हम आधा अक्षर ही पढ़ें, पर पढ़ें जरूर। स्वाध्याय से ही ज्ञान प्राप्त होता है और ज्ञान से ईश्वर की प्राप्ति होती है। शिक्षा से ही लोक-व्यवहार का रहस्य प्रकट होता है। कान्तावियोगः स्वजनापमानः ऋणस्य शेषं कुनृपस्य सेवा। दरिद्रभावो विषमा सभा च विनाग्निमेते प्रदहन्ति कायम्॥ स्त्री का वियोग, अपने लोगों से अनाचार, कर्ज का बंधन, दुष्ट राजा की सेवा, दरिद्रता और अपने प्रतिकूल सभा, ये सभी अग्नि न होते हुए भी शरीर को दग्ध कर देते हैं॥14॥ आचार्य चाणक्य का कहना है कि पत्नी का वियोग 36 CC0. Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri