भारतकोश
सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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बलं विद्या च विप्राणां राज्ञां सैन्यं बलं तथा। वित्तं च वैश्यानां शूद्राणां परिचर्यका॥ ब्राह्मणों का बल विद्या है, राजाओं का बल उनकी सेना है, वैश्यों का बल उनका धन है और शूद्रों का बल छोटा बनकर रहना, अर्थात सेवा-कर्म करना है।।16।। विद्याविहीन, ज्ञानरहित ब्राह्मण की कोई शक्ति नहीं होती, धन यदि वणिक (व्यापारी) के पास न हो तो वह व्यापार करने में असफल हो जाता है। इसलिए धन का होना उसके लिए परम आवश्यक है। इसी प्रकार यदि शूद्र व्यक्ति अपने सेवा कर्म से पीछे हटता है तो वह एक तरह से अपनी शक्ति को ही क्षीण करता है। आचार्य चाणक्य ने भारतीय वर्ण-व्यवस्था, अर्थात ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की शक्तियों का यहां परिचय दिया है। भले ही आज के युग में अपने-अपने कर्म से वर्ण-व्यवस्था की स्थिति को नकार दिया गया हो, पर प्राचीन काल से चली आ रही इस वर्ण-व्यवस्था के मूल में एक सुव्यवस्थित समाज की संरचना का रहस्य छिपा हुआ है। निर्धनं पुरुषं वेश्या प्रजा भग्नं नृपं त्यजेत्। खगाः वीतफलं वृक्षं भुक्त्वा चाऽभ्यागतो गृहम्॥ वेश्या निर्धन मनुष्य को, प्रजा पराजित राजा को, पक्षी फलरहित वृक्ष को व अतिथि उस घर को, जिसमें वे आमंत्रित किए जाते हैं, को भोजन करने के पश्चात छोड़ देते हैं।।17।। आचार्य चाणक्य ने इस श्लोक में सहज अनुभवजन्य बातों को समझाया है। उनका कहना है कि जेब में जब धन न हो तब वेश्या के पास नहीं जाना चाहिए क्योंकि वेश्या को सिर्फ धन से ही मतलब होता है। यह वेश्या का स्वभाव ही है। 38