भारतकोश
सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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इसी प्रकार राजा के पराजित होकर अपमानित होने पर प्रजा भी उसका साथ छोड़ देती है। इसके अतिरिक्त जिस प्रकार फलरहित वृक्ष को त्यागकर पक्षी उड़ जाते हैं, उसी प्रकार अतिथि को भोजन करने के बाद गृहस्थ का घर छोड़ देना चाहिए। जो वस्तुएं गुणहीन हैं, वे त्याज्य हैं, उनका कभी साथ नहीं करना चाहिए। गृहीत्वा दक्षिणां विप्रास्त्यजन्ति यजमानकम्। प्राप्तविद्या गुरुं शिष्याः दग्धाऽरण्यं मृगास्तथा॥ ब्राह्मण दक्षिणा ग्रहण करके यजमान को, शिष्य विद्याध्ययन करने के उपरान्त अपने गुरु को और हिरण जले हुए वन को त्याग देते हैं॥18॥ इस श्लोक में चाणक्य ने कहा है कि किसी प्रयोजन के लिए यदि कोई व्यक्ति किसी के पास जाता है तो उसे कार्य पूरा होते ही वह जगह छोड़ देनी चाहिए। उद्देश्य पूर्ति होने के बाद वहां रुकना किसी भी दृष्टि से उत्तम नहीं है। दुराचारी च दुर्द्दष्टिर्दुराऽऽवासी च दुर्जनः। यन्मैत्री क्रियते पुम्भिर्नरः शीघ्रं विनश्यति॥ बुरा आचरण अर्थात दुराचारी के साथ रहने से, पाप दृष्टि रखने वाले का साथ करने से तथा अशुद्ध स्थान पर रहने वाले से मित्रता करने वाला शीघ्र नष्ट हो जाता है।।19।। बुरी संगति का सदैव बुरा असर पड़ता है। यहां चाणक्य ने इसी ओर ध्यान खींचा है। दुश्चरित्र व्यक्ति का साथ करने अथवा गलत जगहों पर जाने या रहने से मनुष्य का चरित्र नष्ट हो जाता है। जिस व्यक्ति का चरित्र नष्ट हो जाता है, वह जीवित होते हुए भी मरे हुए के समान है। 39