सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहर चीज की एक सीमा होती है, मर्यादा होती है। सीमा से बाहर जाने पर प्रायः नुकसान ही होता है। उदाहरण देते हुए चाणक्य ने बताया कि अनुपम सुंदरी होने के कारण सीता का हरण हुआ और अति अहंकारी होने के कारण रावण का वध हुआ। इसी तरह असुरराज बलि ने दान का वचन देकर वामन को अपना सर्वस्व दान कर दिया। कथा इस प्रकार है, प्रह्लाद पुत्र बलि बड़ा दानवीर था। देवता उससे भयभीत रहते थे। विष्णु भगवान ने वामन अंगुल का रूप धारण करके बलि से तीन पग भूमि मांगी। बलि ने हंसकर तीन पग भूमि देने का वचन दे दिया। तब भगवान विष्णु ने दो पग में तीनों लोक नाप लिए और तीसरा पग बलि के शरीर पर रखकर उसे पाताल भेज दिया। को हि भारः समर्थानां किं दूरं व्यवसायिनाम्। को विदेशः सविद्यानां कः परः प्रियवादिनाम्॥ समर्थ को भार कैसा? व्यवसायी के लिए कोई स्थान दूर क्या? विद्वान के लिए विदेश कैसा? मधुर वचन वाले का शत्रु कौन?॥13॥ समर्थ व्यक्ति कोई भी कार्य सहज ही कर लेता है। उसे कोई भी कार्य भार स्वरूप नहीं लगता। व्यवसायी व्यक्ति अपने व्यवसाय के लिए कहीं भी जा सकता है। वह स्थान की दूरी को नहीं, अपने लाभ को देखता है। इसी तरह विद्वान व्यक्ति के विदेश में भी लाखों मित्र होते हैं। उसे परदेस में कोई कठिनाई नहीं होती। मधुर वचन बोलने वाला व्यक्ति कभी दूसरों के प्रति ईर्ष्या नहीं रखता, सभी को समान भाव से देखता है, उसका कोई शत्रु नहीं होता। अतः सब उसके मित्र बन जाते हैं। 48 CC0 Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri