सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउद्योगे नास्ति दारिद्र्यं जपतो नास्ति पातकम्। मौने च कलहो नास्ति, नास्ति जागरिते भयम्॥ उद्योग-धंधा करने पर निर्धनता नहीं रहती। प्रभु नाम का जप करने वाले का पाप नष्ट हो जाता है। चुप रहने अर्थात सहनशीलता रखने पर लड़ाई-झगड़ा नहीं होता और जो जागता रहता है अर्थात सदैव सजग रहता है उसे कभी भय नहीं सताता।।11।। जो व्यक्ति कर्मठ हैं, परिश्रमी हैं, उद्योग-धंधा करने में आलसी नहीं हैं, निर्धनता उनके निकट नहीं आती। वे सदैव सुखी और प्रसन्न रहते हैं। परिश्रम द्वारा वे सुख-सम्पत्ति अर्जित करते हैं। जो प्रभु को पूरी तरह समर्पित होकर उसके नाम का निरंतर जाप करते हैं, उसे स्मरण करते रहते हैं, उनके सभी पाप स्वतः ही नष्ट हो जाते हैं। क्रोध अर्थात पलटकर आक्रमण होने से सदैव झगड़ा बढ़ता है। यदि व्यक्ति दूसरे की कटु बात का जवाब न दे और सहनशील बना रहे तो सामने वाले का क्रोध स्वतः ही नष्ट हो जाता है। झगड़ा बढ़ नहीं पाता। झगड़ा तभी बढ़ता है जब ईंट का जवाब पत्थर से दिया जाता है। जो व्यक्ति जीवन में सावधान रहता है, उसे कभी भय नहीं सताता। भाव यही है कि परिश्रम से समृद्धि आती है, प्रभु स्मरण से पापों का नाश होता है, सहनशीलता से संघर्ष का अंत होता है और सजगता से भय कभी नहीं होता। अतिरूपेण वै सीता अतिगर्वेण रावणः। अतिदानं बलिर्दत्वा अति सर्वत्र वर्जयेत्॥ अति सुंदर होने के कारण सीता का हरण हुआ, अत्यंत अहंकार के कारण रावण मारा गया, अत्यधिक दान के कारण राजा बलि बांधा गया। अतः सभी के लिए अति ठीक नहीं है। 'अति सर्वथा वर्जयेत्।' अति को सदैव छोड़ देना चाहिए।।12।। 47 CC0. Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri