भारतकोश
सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

पृष्ठ 61, कुल 196 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 61

जिसमें प्राणी-मात्र के लिए दया-भाव न हो। ऐसे गुरु को नहीं अपनाना चाहिए, जिसमें विद्वता न हो। ऐसी पत्नी को स्वीकार नहीं करना चाहिए जो क्रोधी स्वभाव की हो और कलह करने वाली हो। साथ ही ऐसे परिजनों से संबंध नहीं रखना चाहिए जो दुःख-सुख में काम न आते हों। अध्वा जरा मनुष्याणां वाजिनां बंधनं जरा। अमैथुनं जरा स्त्रीणां वस्त्राणामातपो जरा॥ बहुत ज्यादा पैदल चलना मनुष्यों को बुढ़ापा ला देता है, घोड़ों को एक ही स्थान पर बांधे रखना और स्त्रियों के साथ पुरुष का समागम (मैथुन) न होना और वस्त्रों को लगातार धूप में डाले रखने से बुढ़ापा आ जाता है।। 17 ।। निरन्तर यात्रा करते रहने से खान-पान और शरीर को आराम नहीं मिल पाता। इससे शरीर थककर चूर-चूर हो जाता है। युवावस्था की उमंग क्षीण हो जाती है। घोड़ों को यदि घुमाया-फिराया न जाए तो वे आलसी हो जाते हैं। आलस्य शरीर को शिथिल कर देता है। स्त्री-पुरुष का समागम स्वाभाविक क्रिया है। यदि स्त्री अथवा पुरुष इससे वंचित रह जाएं तो उन्हें बुढ़ापा घेर लेता है। वस्त्रों के धूप में पड़े रहने से वे पुराने पड़कर जर-जर हो जाते हैं। कः कालः कानि मित्राणि को देशः कौ व्ययऽऽगमौ। कश्चाऽहं का च मे शक्तिरिति चिन्त्यं मुहुर्मुहुः ॥ बुद्धिमान व्यक्ति को बार-बार यह सोचना चाहिए कि हमारे मित्र कितने हैं, हमारा समय कैसा है—अच्छा है या बुरा और यदि बुरा है तो उसे अच्छा कैसे बनाया जाए। हमारा निवास-स्थान कैसा है (सुखद, अनुकूल), हमारी आय कितनी है और व्यय कितना है, मैं कौन हूं-आत्मा हूं, अथवा शरीर, स्वाधीन हूं अथवा पराधीन तथा मेरी शक्ति कितनी है।।18।। 59 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri