भारतकोश
सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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इन प्रश्नों पर विचार करते हुए मनुष्य को अपना जीवन बिताना चाहिए तथा आत्मकल्याण के लिए सदा प्रयत्नशील रहना चाहिए। जो व्यक्ति इन बातों पर विचार नहीं करता, वह पत्थर के समान निर्जीव होता है और सदा लोगों के पांवों में पड़ा ठोकरें खाता रहता है। मनुष्य को समझदारी से काम लेकर जीवन बिताना चाहिए। जनिता चोपनेता च यस्तु विद्यां प्रयच्छति। अन्नदाता भयत्राता पञ्चैवे पितरः स्मृताः॥ जन्म देने वाला पिता, उपनयन-संस्कार कराने वाला, विद्या देने वाला गुरु, अन्नदाता और भय से रक्षा करने वाला—ये पांच 'पितर' माने जाते हैं॥19॥ आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक में पंच पितर के साथ एक पितर को रक्षा करने वाला भी कहा है। रक्षा जीवित ही कर सकता है, मरा हुआ नहीं। मरा अपनी ही रक्षा नहीं कर सकता तो दूसरों की क्या करेगा। गीता में भी कौरव-पांडवों की सेना के आमने-सामने खड़े हो जाने के समय के वर्णन में 'पितर' शब्द आया है। अर्जुन ने वहां खड़े हुए पितरों-चाचा, ताऊ, पिता, दादा आदि को देखा था। पितर सिर्फ मरे हुए के लिए आता है, ऐसा सोचना भ्रामक है। राजपत्नी गुरोः पत्नी मित्रपत्नी तथैव च। पत्नी माता स्वमाता च पञ्चैता मातरः स्मृताः॥ राजा की पत्नी, गुरु की स्त्री, मित्र की पत्नी, पत्नी की माता (सास) और अपनी जननी—ये पांच माताएं मानी गई हैं। इनके साथ मातृवत् व्यवहार ही करना चाहिए॥20॥ प्रस्तुत श्लोक में आचार्य चाणक्य ने पांच माताओं की प्रतिष्ठा स्थापित करते हुए कहा है—राजा चूंकि पूरे राज्य की जनता के लिए पिता तुल्य होता है, अतः राजा की पत्नी माता रूप 60 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri