सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
इन प्रश्नों पर विचार करते हुए मनुष्य को अपना जीवन बिताना चाहिए तथा आत्मकल्याण के लिए सदा प्रयत्नशील रहना चाहिए। जो व्यक्ति इन बातों पर विचार नहीं करता, वह पत्थर के समान निर्जीव होता है और सदा लोगों के पांवों में पड़ा ठोकरें खाता रहता है। मनुष्य को समझदारी से काम लेकर जीवन बिताना चाहिए। जनिता चोपनेता च यस्तु विद्यां प्रयच्छति। अन्नदाता भयत्राता पञ्चैवे पितरः स्मृताः॥ जन्म देने वाला पिता, उपनयन-संस्कार कराने वाला, विद्या देने वाला गुरु, अन्नदाता और भय से रक्षा करने वाला—ये पांच 'पितर' माने जाते हैं॥19॥ आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक में पंच पितर के साथ एक पितर को रक्षा करने वाला भी कहा है। रक्षा जीवित ही कर सकता है, मरा हुआ नहीं। मरा अपनी ही रक्षा नहीं कर सकता तो दूसरों की क्या करेगा। गीता में भी कौरव-पांडवों की सेना के आमने-सामने खड़े हो जाने के समय के वर्णन में 'पितर' शब्द आया है। अर्जुन ने वहां खड़े हुए पितरों-चाचा, ताऊ, पिता, दादा आदि को देखा था। पितर सिर्फ मरे हुए के लिए आता है, ऐसा सोचना भ्रामक है। राजपत्नी गुरोः पत्नी मित्रपत्नी तथैव च। पत्नी माता स्वमाता च पञ्चैता मातरः स्मृताः॥ राजा की पत्नी, गुरु की स्त्री, मित्र की पत्नी, पत्नी की माता (सास) और अपनी जननी—ये पांच माताएं मानी गई हैं। इनके साथ मातृवत् व्यवहार ही करना चाहिए॥20॥ प्रस्तुत श्लोक में आचार्य चाणक्य ने पांच माताओं की प्रतिष्ठा स्थापित करते हुए कहा है—राजा चूंकि पूरे राज्य की जनता के लिए पिता तुल्य होता है, अतः राजा की पत्नी माता रूप 60 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
में होती है, उसका सम्मान आवश्यक है। गुरु पिता के समान होता है अतः उसकी पत्नी भी माता समान होती है, सम्मान की पात्र है। मित्र का महत्त्व अत्यंत विश्वसनीय पात्र के रूप में है। मित्र सुख-दुख में बराबर का साथी होता है, अतः मित्र की पत्नी को भी माता के समान मानना चाहिए। पत्नी की माता, अर्थात सास को भी माता रूप में मानना चाहिए। पत्नी जो जीवनसंगिनी बन गई, उसकी मां को माता समान मानना चाहिए। अपनी मां तो मां होती ही है। उसके प्रति कर्त्तव्यों का निर्वाह करना चाहिए। अग्निदेवो द्विजातीनां मुनीनां हृदि दैवतम्। प्रतिमा स्वल्पबुद्धीनां सर्वत्र समदर्शिनः॥ अग्नि देव ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों के देवता हैं। ऋषि-मुनियों के देवता हृदय में हैं। अल्प बुद्धि वालों के देवता मूर्तियों में हैं और सारे संसार को समान रूप से देखने वालों के देवता सभी जगह निवास करते हैं॥21॥ जो तत्त्वज्ञानी हैं, जिन्होंने इस चराचर सृष्टि के रहस्य को जान लिया है, उनके लिए सम्पूर्ण ब्रह्मांड ही उस परम शक्तिसम्पन्न परमात्मा का घर है। वह कण-कण में व्याप्त है। सभी प्राणियों में है। जड़ में है, चेतन में है, परंतु दो बार जन्म लेने वाले, एक बार माता के गर्भ से और दूसरी बार गुरु के द्वारा संस्कारित होने पर, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य अग्नि अर्थात 'यज्ञ' को ही अपना देवता मानते हैं। ऋषि-मुनि परमात्मा के स्वरूप का ध्यान अपने हृदय में करते हैं और अल्प बुद्धि लोग पत्थरों की मूर्ति में ही भगवान का स्वरूप तलाशते हैं। यह अपनी-अपनी आस्था की बात है। 61
॥ अथ पंचम अध्याय ॥ गुरुरग्निर्द्विजातिनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः। पतिरेव गुरुः स्त्रीणां सर्वस्याऽभ्यागतो गुरुः॥ स्त्रियों का गुरु पति है। अतिथि सबका गुरु है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य का गुरु अग्नि है तथा चारों वर्णों का गुरु ब्राह्मण है।।1।। यहां आचार्य चाणक्य ने ब्राह्मणों की श्रेष्ठता का प्रतिपादन किया है, परंतु जो ज्ञानी है, वही ब्राह्मण है। कोई जन्म से ही ब्राह्मण नहीं हो जाता। इस श्लोक में 'ब्राह्मण' से चाणक्य का तात्पर्य ज्ञान से परिपूर्ण व्यक्ति से है। यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते, निघर्षणच्छेदनतापताडनैः। तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते, त्यागेन, शीलेन, गुणेन, कर्मणा॥ जिस प्रकार घिसने, काटने, आग में तापने-पीटने, इन चार उपायों से सोने की परख की जाती है, वैसे ही त्याग, शील, गुण और कर्म, इन चारों से मनुष्य की पहचान होती है।।2।। व्यक्तित्व की पहचान, आदमी के शील-स्वभाव, उसके कर्म, उसके गुण और उसकी त्याग-भावना के द्वारा होती है। 62 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
तावद् भयेषु भेतव्यं यावद् भयमनगतम्। आगतं तु भयं दृष्ट्वा प्रहर्तव्यमशंकया॥ भय से तभी तक डरना चाहिए, जब तक भय आए नहीं। आए हुए भय को देखकर निशंक होकर प्रहार करना चाहिए, अर्थात उस भय की परवाह नहीं करनी चाहिए॥३॥ भयभीत व्यक्ति अपने सारे कार्य भय के वशीभूत होकर बिगाड़ लेता है, लेकिन जो व्यक्ति भय के उपस्थित होने पर उसका विरोध करता है, उसका कार्य कभी खराब नहीं होता। एकोदरसमुद्भूताः एकनक्षत्रजातकाः। न भवन्ति समाः शीले यथा बदरिकंटका॥ एक ही माता के पेट से और एक ही नक्षत्र में जन्म लेने वाली संतान समान गुण और शील वाली नहीं होती, जैसे बेर के कांटे॥4॥ सभी बच्चों का स्वभाव अलग-अलग होता है। भले ही वे जुड़वां पैदा हुए हों। बेर के पेड़ पर फल भी लगता है और कांटे भी। यह ईश्वर की विचित्र लीला है जिसे समझना सरल नहीं। निःस्पृहो नाऽधिकारी स्यान्नाकामी मंडनप्रियः। नाऽविदग्धः प्रियं ब्रूयात् स्पष्टवक्ता न वञ्चकः॥ जिसका जिस वस्तु से लगाव नहीं है, उस वस्तु का वह अधिकारी नहीं है। यदि कोई व्यक्ति सौंदर्य प्रेमी नहीं होगा तो श्रृंगार-शोभा के प्रति उसकी आसक्ति नहीं होगी। मूर्ख व्यक्ति प्रिय और मधुर वचन नहीं बोल पाता और स्पष्ट वक्ता कभी धोखेबाज, धूर्त या मक्कार नहीं होता॥5॥ जो व्यक्ति सहज है, जिसमें किसी के प्रति कोई लगाव या दुराव नहीं है, वह व्यक्ति व्यर्थ की साज-संवार से अपने को अलग 63 CC0. Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
रखता है। जो चालाक और धूर्त होते हैं, वे ही मधुर वचन बोलते हैं, मूर्ख नहीं। साफ-साफ बोलने वाला कड़वा जरूर होता है, पर धोखेबाज नहीं होता। मूर्खाणां पंडिता द्वेष्याः अधनानां महाधनाः। वाराऽऽ ङ्गनाः कुलस्त्रीणां सुभगानां च दुर्भगाः॥ मूर्खों के पंडित, दरिद्रों के धनी, विधवाओं की सुहागिनें और वेश्याओं की कुल-धर्म रखने वाली पतिव्रता स्त्रियां शत्रु होती हैं॥6॥ यह सांसारिक नियम है कि मूर्ख व्यक्ति पंडितों से ईर्ष्या करते हैं, निर्धन व्यक्ति धनिकों से ईर्ष्या करते हैं। वेश्याएं या व्यभिचारिणी स्त्रियां पतिव्रत धर्म का पालन करने वाली कुल-वधुओं से ईर्ष्या करती हैं और विधवाएं सुहागिनों को देखकर अपने भाग्य को कोसती रहती हैं। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। दूसरे को सुखी देखकर कोई सुखी नहीं होता। आलस्योपहता विद्या परहस्तगतं स्त्रियः। अल्पबीजं हतं क्षेत्रं हतं सैन्यमनायकम्॥ आलस्य से (अध्ययन न करना) विद्या नष्ट हो जाती है। दूसरे के पास गई स्त्री, बीज की कमी से खेती और सेनापति के न होने से सेना नष्ट हो जाती है॥7॥ युद्ध क्षेत्र में सेनानायक का अभाव सेना का मनोबल तोड़ देता है और वह शत्रु का सामना न करके भागने लगती है और हार जाती है। इसी प्रकार यदि खेत में पर्याप्त बीज न डाला जाए तो खेती अथवा उपज ठीक से नहीं हो पाती। दूसरे के पास गई स्त्री के सकुशल लौटने की उम्मीद कम ही रहती है और यदि 64 CC0. Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri सम्पूर्ण चाणक्य नीति-4
अध्ययन की प्रक्रिया को निरंतर बनाए न रखा जाए तो जो विद्या अर्जित की जाती है, वह धीरे-धीरे स्मृति से मिटने लगती है। अतः विद्या, स्त्री, कृषि और सेना के प्रति सदैव सजग रहना चाहिए। अभ्यासाद्धार्यते विद्या कुलं शीलेन धार्यते। गुणेन ज्ञायते त्वार्यः कोपो नेत्रेण गम्यते॥ विद्या अभ्यास से आती है, सुशील स्वभाव से कुल का बड़प्पन होता है। श्रेष्ठत्व की पहचान गुणों से होती है और क्रोध का पता आंखों से लगता है॥४॥ इस प्रकार विद्या की रक्षा के लिए अभ्यास करते रहना जरूरी है। शील-स्वभाव से कुल को मान-सम्मान मिलता है, सद्गुणों से श्रेष्ठता का पता चलता है और क्रोध का पता आंखों से लग जाता है। भाव यह है कि मनुष्य यदि अपने भावों को छिपाना भी चाहे तो छिपा नहीं सकता। स्वभाव, गुण और चेहरे से मनुष्य का पूरा परिचय मिल जाता है। वित्तेन रक्ष्यते धर्मो विद्या योगेन रक्ष्यते। मृदुना रक्ष्येत भूपः सत्स्त्रिया रक्ष्यते गृहम्॥ धर्म की रक्षा धन से, विद्या की रक्षा निरंतर साधना से, राजा की रक्षा मृदु स्वभाव से और पतिव्रता स्त्रियों से घर की रक्षा होती है॥9॥ धर्मानुष्ठान (यज्ञ, धर्मशालाएं, तीर्थाटन, मंदिर निर्माण, पूजा आदि) के लिए धन अनिवार्य होता है। बिना अभ्यास के विद्या भी पास नहीं टिकती। राजा अपने मृदु स्वभाव से ही प्रजा को अपने अनुकूल करता है और कुलीन स्त्रियों से ही घर-गृहस्थी की मर्यादा बनी रहती है। अतः इसका ध्यान रखना बहुत जरूरीं है। 65 CC0 Vashistha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
अन्यथा वेदपाण्डित्यं शास्त्रमाचारमन्यथा। अन्यथा कुवचः शान्तं लोकाः क्लिश्यन्ति चान्यथा॥ वेद पांडित्य व्यर्थ है, शास्त्रों का ज्ञान व्यर्थ है, ऐसा कहने वाले स्वयं ही व्यर्थ हैं। उनकी ईर्ष्या और दुःख भी व्यर्थ हैं। वे व्यर्थ में ही दुःखी होते हैं, जबकि वेदों और शास्त्रों का ज्ञान व्यर्थ नहीं है॥10॥ मूर्खता के वशीभूत होकर ही लोग आप्त ज्ञान को व्यर्थ बताते हैं, जबकि ज्ञान कोई भी व्यर्थ नहीं होता। ऐसा वे ही लोग कहते हैं जो वेदों में छिपे ज्ञान के मर्म को समझ नहीं पाते। जिन्हें शास्त्रों का ,विश्लेषण करना नहीं आता। दारिद्र्यनाशनं दानं शीलं दुर्गतिनाशनम्। अज्ञाननाशिनी प्रज्ञा भावना भयनाशिनी॥ दरिद्रता का नाश दान से, दुर्गति का नाश शालीनता से, मूर्खता का नाश सद्बुद्धि से और भय का नाश अच्छी भावना से होता है॥11॥ जो व्यक्ति दरिद्र रहते हुए भी सामर्थ्य के अनुसार दान देकर दूसरों के कष्टों का निवारण करता है, उसका दान समृद्ध व्यक्ति के दान से श्रेष्ठ होता है। शालीनता के साथ संकट काल को सहन करने वाला व्यक्ति अपने संकटों पर विजय प्राप्त करता है तथा सुशीलता कष्ट को दूर करती है। इसी प्रकार ज्ञानी व्यक्ति अज्ञान का नाश करता है। नास्ति कामसमो व्याधिर्नास्ति मोहसमो रिपुः। नाऽस्ति कोपसमो वह्निर्नार्र्ऽस्ति ज्ञानात् परं सुखम्॥ काम-वासना के समान दूसरा रोग नहीं, मोह के समान शत्रु नहीं, क्रोध के समान आग नहीं और ज्ञान से बढ़कर सुख नहीं॥12॥ 66
काम-वासना में लिप्त व्यक्ति धीरे-धीरे व्यभिचारी हो जाता है। काम-वासना एक भयानक रोग की भांति उसे जकड़ लेती है। मोह में पड़ा व्यक्ति अंधा हो जाता है। उसे भला-बुरा कुछ दिखाई नहीं देता। क्रोधी व्यक्ति क्रोध रूपी अग्नि में स्वयं तो जलता ही है, दूसरों को भी जलाता है। इस संसार में यदि कहीं सुख और आनंद है तो ज्ञानी बनने में है। जन्ममृत्यु हि यात्येको भुनक्त्येकः शुभाऽशुभम्। नरकेषु पतत्येक एको याति परां गतिम्॥ मनुष्य अकेला ही जन्म लेता है और अकेला ही मरता है। वह अकेला ही अपने अच्छे-बुरे कर्मों को भोगता है। वह अकेला ही नर्क में जाता है और परम पद को पाता है।।13।। जीवन और मृत्यु, कर्मों का भोग, नरक वास और परम शक्ति का सान्निध्य मनुष्य अकेला ही प्राप्त करता है। कोई उसके साथ न तो आता है, न जाता है। कोई उसका सहायक नहीं होता। सब भाई-बंधु यहीं रह जाते हैं। वह अकेला आता है और अकेला ही जाता है। जीवन का यही चक्र है, जो शाश्वत है, सनातन है। तृणं ब्रह्मविदः स्वर्गस्तृणं शूरस्य जीवितम्। जिताऽक्षस्य तृणं नारी निःस्पृहस्य तृणं जगत्॥ ब्रह्मज्ञानियों की दृष्टि में स्वर्ग तिनके के समान है, शूरवीर की दृष्टि में जीवन तिनके के समान है, इन्द्रजीत के लिए स्त्री तिनके के समान है और जिसे किसी भी वस्तु की कामना नहीं है, उसकी दृष्टि में यह सारा संसार तिनके के समान है। उसे सारा संसार क्षणभंगुर दिखाई देता है। वह तत्त्वज्ञानी हो जाता है।।14।। प्रस्तुत श्लोक के माध्यम से आचार्य चाणक्य ने शिक्षा दी है कि मनुष्य को ज्ञान का अर्जन करना चाहिए और यह 67
ज्ञान इस हद तक सीखना चाहिए कि वह बह्मज्ञानी बन जाए। यदि मनुष्य शूरवीर है तो उसे जीवन का मोह नहीं होता, क्योंकि उसका जन्म ही वीरता दिखाते हुए प्रोणोत्सर्ग कर देने के लिए हुआ है। इंद्रियों को वश में रखने वाले के लिए स्त्री का कोई महत्त्व नहीं, वह तो उसके लिए तृण के समान है। इसी तरह जिसे लोभ नहीं उसके लिए संसार का कोई मोह नहीं हो सकता। विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च। व्याधितस्यौषधं मित्रं धर्मो मित्रं मृतस्य च॥ प्रवास (विदेश) में विद्या ही मित्र होती है, घर में पत्नी मित्र होती है, रोगियों के लिए औषधि मित्र है और मरते हुए व्यक्ति का मित्र धर्म होता है अर्थात उसके सत्कर्म होते हैं, इसीलिए विद्या, पतिव्रता विदुषी स्त्री, रोग के समय उचित औषधि और मृत्यु काल निकट आने पर व्यक्ति के सत्कर्म ही उसका साथ देते हैं॥15॥ आचार्य चाणक्य के उपरोक्त श्लोक के संदर्भ में विद्या के लिए कहा गया है कि विद्या कामधेनु के समान गुणों से युक्त है। यह असमय फल देने वाली है। यह प्रवास में माता के समान हितकारिणी और रक्षिका है। विद्या को गुप्त धन माना गया है। पत्नी पुरुष का आधा अंग है। पत्नी पति की सर्वश्रेष्ठ मित्र होती है। पत्नी धर्म, अर्थ और काम का मूल होती है। यहां तक कि भवसागर पार उतरने की इच्छा वाले पुरुष की सहयोगी होती है। रोगी के लिए औषध और मृत्यु के बाद उसके अच्छे कर्म मनुष्य के साथी होते हैं। CCO. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri 68
वृथा वृष्टिः समुद्रेषु वृथा तृप्तेषु भोजनम्। वृथा दानं धनाढ्येषु वृथा दीपो दिवाऽपि च॥ समुद्र में वर्षा का होना व्यर्थ है, तृप्त व्यक्ति को भोजन कराना व्यर्थ है, धनिक को दान देना व्यर्थ है और दिन में दीपक जलाना व्यर्थ है।।16।। वर्षा की जरूरत सूखे मैदानों और कृषि के लिए खेतों में अधिक होती है, भोजन की जरूरत भूखे व्यक्ति के लिए होती है। दान की जरूरत निर्धन के लिए होती है और दीपक की जरूरत रात्रि का अंधकार दूर करने के लिए होती है। नोट—समुद्र में वर्षा, तृप्त व्यक्ति को भोजन खिलाना, धनवान को दान देना और दिन के प्रकाश में दीपक जलाना, ये सभी कार्य निरर्थक हैं, व्यर्थ हैं। नाऽस्ति मेघसमं तोयं नाऽस्ति चात्मसमं बलम्। नाऽस्ति चक्षुःसमं तेजो नाऽस्ति धान्यसमं प्रियम्॥ बादल के जल के समान दूसरा जल नहीं है, आत्मबल के समान दूसरा बल नहीं है, अपनी आंखों के समान दूसरा प्रकाश नहीं है और अन्न के समान दूसरा प्रिय पदार्थ नहीं है।।17।। बादलों का जल सर्वाधिक स्वच्छ और स्वास्थ्यवर्धक होता है। आदमी का आत्म बल सभी शक्तियों से ऊपर होता है। आत्मबल हो तो मनुष्य कठिन-से-कठिन संकट व परिस्थितियों का भी हंसते-हंसते सामना कर लेता है तथा सफलता को प्राप्त करता है। जिन नेत्रों में ज्योति है, वे ही बाहरी प्रकाश और सौंदर्य का पान कर सकते हैं और बिना अन्न के जीवन की सुरक्षा असंभव है। 69 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
अधना धनमिच्छन्ति वाचं चैव चतुष्पदाः। मानवाः स्वर्गमिच्छन्ति मोक्षमिच्छन्ति देवताः॥ निर्धन धन चाहते हैं, पशु वाणी चाहते हैं। मनुष्य स्वर्ग की इच्छा करते हैं और देवगण मोक्ष चाहते हैं॥18॥ संसार में सभी प्राणी किसी-न-किसी अभाव से ग्रस्त रहते हैं। इस अभाव को मिटाने के लिए वे प्रयत्न करते हैं। प्रायः जिस प्राणी के पास जिस वस्तु का अभाव होता है, वह उसी को पाना चाहता है। सत्येन धार्यते पृथिवी सत्येन तपते रविः। सत्येन वाति वायुश्च सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम्॥ सत्य पर पृथ्वी टिकी है, सत्य से सूर्य तपता है, सत्य से वायु बहती है, संसार के सभी पदार्थ सत्य में निहित हैं॥19॥ यहां सत्य की महत्ता का प्रतिपादन करते हुए आचार्य चाणक्य कहते हैं कि यह समस्त पृथ्वी, हवा की गति, सूर्य की तपिश और संपूर्ण ब्रह्मांड सत्य में ही समाया हुआ है। सत्य के द्वारा ही सारा ब्रह्मांड चलाया जाता है और कहा भी गया है 'सत्यं शिवं सुन्दरम्।' अर्थात सत्य ही सबसे बड़ा धर्म है, सत्य से बढ़कर कुछ भी नहीं है। चला लक्ष्मीश्चलाः प्राणाश्चलं जीवित-यौवनं। चलाचले च संसारे धर्म एको हि निश्चलः॥ लक्ष्मी अनित्य और अस्थिर है, प्राण भी अनित्य है और जीवन भी अनित्य है। इस चलते-फिरते संसार में केवल धर्म ही स्थिर है॥20॥ इस संसार में केवल धर्म ही ऐसा है जो स्थिर रूप से मानव हृदय में रहता है। इसके अलावा समृद्धि (धन-सम्पत्ति), 70
जीवन और सभी चराचर पदार्थ समय आने पर नष्ट हो जाने वाले हैं, लेकिन धर्म अजर-अमर है। मनुष्य का सभी करा-धरा यहीं रह जाएगा, केवल धर्म ही उसके साथ जाएगा। अतः धर्म का संग्रह करना ही श्रेष्ठ है। नराणां नापितो धूर्तः पक्षिणां चैव वायसः। चतुष्पदां शृगालस्तु स्त्रीणां धूर्ता च मालिनी॥ पुरुषों में नाई धूर्त होता है, पक्षियों में कौवा, पशुओं में गीदड़ और स्त्रियों में मालिन धूर्त होती है।।21।। ये चारों सदैव दूसरों के कार्य को बिगाड़ने वाले होते हैं। जनिता चोपनेता च यस्तु विद्यां प्रयच्छति। अन्नदाता भयत्राता पञ्चैते पितरः स्मृताः॥ मनुष्य को जन्म देने वाला, यज्ञोपवीत संस्कार कराने वाला पुरोहित, विद्या देने वाला आचार्य, अन्न देने वाला, भय से मुक्ति दिलाने वाला अथवा रक्षा करने वाला, ये पांच पिता कहे गए हैं।।22।। पिता जीवन देता है, पुरोहित समाज में प्रतिष्ठित करने के लिए यज्ञोपवीत संस्कार कराता है, आचार्य ज्ञान देकर जीवन और जगत के समस्त कार्य-व्यापार से परिचित कराता है, अन्न उत्पन्न करने वाला कृषक हमारे लिए भोजन की व्यवस्था करता है और राजा हमारी शत्रु से रक्षा करके हमें भयमुक्त करता है। अतः समाज ने इन्हें पिता अर्थात-पालन करने वाले का उच्च स्थान दिया है। 71 CC0. Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
॥ अथ षष्ठम अध्याय ॥ श्रुत्वा धर्मं विजानाति श्रुत्वा त्यजति दुर्मतिम्। श्रुत्वा ज्ञानमवाप्नोति श्रुत्वा मोक्षमवाप्नुयात्॥ मनुष्य शास्त्रों को पढ़कर धर्म को जानता है और मूर्खता को त्यागकर ज्ञान प्राप्त करता है तथा शास्त्रों को सुनकर मोक्ष प्राप्त करता है॥1॥ धर्मोपदेशक के प्रवचन सुनकर ही बहुत-से भक्तजन अपना जीवन संवार लेते हैं। गुरु भी जब शिक्षा देता है, तब वह अपने शिष्यों को बोलकर ही विद्यादान देता है और शिष्य श्रवण करके ही ज्ञान प्राप्त करते हैं। पक्षिणां काकश्चाण्डालः पशूनां चैव कुक्कुरः। मुनीनां कोपीचाण्डालः सर्वेषां चैव निन्दकः॥ पक्षियों में कौआ, पशुओं में कुत्ता, ऋषि-मुनियों में क्रोध करने वाला और मनुष्यों में चुगली करने वाला चांडाल अर्थात नीच होता है॥2॥ पापकर्म व चुगली करना मानव-जीवन के दोष माने गए हैं। इन्हें करने वाला मनुष्य ऋषि-मुनि होने पर भी चांडाल होता है, जैसे
पक्षियों में कौए और पशुओं में कुत्ते को नीच माना गया है। भस्मना शुद्ध्यते कांस्यं ताम्रमम्लेन शुद्ध्यते। रजसा शुद्ध्यते नारी नदी वेगेन शुद्ध्यति॥ कांसे का पात्र राख द्वारा मांजने से शुद्ध होता है, तांबे का पात्र खटाई के रगड़ने से शुद्ध होता है। स्त्री रजस्वला होने से पवित्र होती है और नदी तीव्र गति से बहने से निर्मल हो जाती है॥३॥ हर वस्तु और प्राणी की अपनी-अपनी प्रवृत्ति है। नदी का पानी यदि रुक जाए तो वह नदी नहीं रहती। उसका रुका हुआ पानी गंदा हो जाता है। पानी जब वेग से बहता है, तभी वह शुद्ध होता है। इसी प्रकार रजस्वला होने के बाद ही स्त्री गर्भ धारण करने योग्य बनती है और तांबे के बर्तन को अम्ल (खटाई) से और कांसे के बर्तन को राख से मांजकर शुद्ध किया जा सकता है। किसी मनुष्य की गंदी आदतों को शुद्ध करने के लिए इसी भांति साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपनानी चाहिए, ऐसा आचार्य चाणक्य का मत है। भ्रमन् सम्पूज्यते राजा भ्रमन् सम्पूज्यते द्विजः। भ्रमन् सम्पूज्यते योगी भ्रमन्ती स्त्री भ्रमन्ती विनश्यति॥ प्रजा की रक्षा के लिए भ्रमण करने वाला राजा सम्मानित होता है, भ्रमण करने वाला योगी और ब्राह्मण सम्मानित होता है, किन्तु इधर-उधर घूमने वाली स्त्री भ्रष्ट होकर नष्ट हो जाती है॥४॥ जो राजा प्रजा के सुख-दुख में सम्मिलित होकर उनकी परेशानियों को दूर करता है, प्रजा उस राजा का सदैव आदर करती है। इसी प्रकार जो योगी और ब्राह्मण प्रजा के हित में भ्रमण करते रहते हैं और उनके सभी धार्मिक, सामाजिक आर्थिक कार्यों में उनकी मंगलकामना करते हैं, लोग 73 CCO. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
अध्याय ७-९: बुद्धि-कौशल, मित्र-परीक्षा व राजा-प्रजा
उनका सम्मान करते हैं, उन्हें पूज्य मानते हैं परंतु इधर-उधर भटकने वाली स्त्री पतित होकर नष्ट हो जाती है। यस्याऽर्थास्तस्य मित्राणि यस्याऽर्थास्तस्य बांधवाः। यस्याऽर्थाः स पुमांल्लोके यस्याऽर्थाः स च पण्डितः॥ जिसके पास धन है उसके अनेक मित्र होते हैं, उसी के अनेक बंधु-बांधव होते हैं, वही पुरुष कहलाता है और वही पंडित कहलाता है॥5॥ धन का महत्त्व इतना बड़ा है कि जिसके पास यह होता है, सब उसे ही महापुरुष, पंडित (विद्वान) और सबका हितैषी मानने लगते हैं। सब उससे मित्रता करना चाहते हैं और उससे संबंध बनाना चाहते हैं। उसके सभी दोष, अवगुण और व्यसन पैसे की चकाचौंध के सामने छिप जाते हैं। तादृशी जायते बुद्धिव्यवसायोऽपि तादृशः। सहायास्तादृशा एव यादृशी भवितव्यता॥ जैसी होनहार होती है, वैसी ही बुद्धि हो जाती है, उद्योग-धंधा भी वैसा ही हो जाता है और सहायक भी वैसे ही मिल जाते हैं॥6॥ 'होनी बलवान है' यह मुहावरा काफी प्रचलित है। आदमी के भाग्य में जो लिखा है, वह होकर ही रहता है। उसी के अनुसार सारे बानक बनते चले जाते हैं। आदमी कुछ नहीं करता, उसका भाग्य ही सब कुछ करता है। कालः पचति भूतानि कालः संहरते प्रजाः। कालः सुप्तेषु जागर्ति कालो हि दुरतिक्रमः॥ काल (समय, मृत्यु) ही पंच भूतों (पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश) को पचाता है और सब प्राणियों 74 CC0 Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
का संहार भी काल ही करता है। संसार में प्रलय हो जाने पर वह सुप्तावस्था अर्थात स्वप्नवत रहता है। काल की सीमा को निश्चय ही कोई भी लांघ नहीं सकता॥7॥ काल की गति को कोई रोक नहीं सकता। समय चक्र में आकर सभी को एक-न-एक दिन नष्ट होना पड़ता है। काल की गति जीवन से मृत्यु तक शाश्वत है, सनातन है। इससे बचना असंभव है। यह किसी को नहीं छोड़ता। न पश्यति च जन्मान्धः कामान्धो नैव पश्यति। न पश्यति मदोन्मत्तोः ह्यर्थी दोषान् न पश्यति॥ जन्म से अंधे को कुछ दिखाई नहीं देता, काम में आसक्त व्यक्ति को भला-बुरा कुछ सुझाई नहीं देता, मद से मतवाला बना प्राणी कुछ सोच नहीं पाता और अपनी जरूरत को सिद्ध करने वाला दोष नहीं देखा करता॥8॥ धन और शक्ति के अहंकार से भरा व्यक्ति अपना विवेक खो बैठता है। उसे केवल अपना स्वार्थ ही सर्वोपरि दिखाई देता है। उसकी दशा उस अंधे के समान होती है, जो जन्म से अंधा होता है। स्वयं कर्म करोत्यात्मा स्वयं तत्फलमश्नुते। स्वयं भ्रमति संसारे स्वयं तस्माद् द्विमुच्यते॥ जीव स्वयं ही (नाना प्रकार के अच्छे-बुरे) कर्म करता है, उसका फल भी स्वयं ही भोगता है। वह स्वयं ही संसार की मोह-माया में फंसता है और स्वयं ही इसे त्यागता है॥9॥ वस्तुतः मनुष्य के हाथों में कुछ नहीं है। ईश्वर की प्रेरणा से वह संसार में रहते हुए नाना प्रकार के कर्मों में फंसता है 75
और जब उन कर्मों का अच्छा-बुरा फल उसे भुगतना पड़ता है, तब वह संसार की मोह-माया से मुक्त होने के लिए छटपटाता है और परमात्मा को याद करके इस जंजाल से निकलना चाहता है। राजा राष्ट्रकृतं पापं राज्ञः पापं पुरोहितः। भर्ता च स्त्रीकृतं पापं शिष्यपापं गुरुस्तथा॥ राजा अपनी प्रजा के द्वारा किए गए पाप को, पुरोहित राजा के पाप को, पति अपनी पत्नी के द्वारा किए गए पाप को और गुरु अपने शिष्य के पाप को भोगता है।।10।। राजा का कर्त्तव्य है कि वह अपनी प्रजा को पाप कर्म की ओर न बढ़ने दे, पुरोहित अथवा मंत्री का कर्त्तव्य है कि वह राजा को पाप की ओर प्रवृत्त न होने दे और इसी तरह पति का कर्त्तव्य है कि वह अपनी पत्नी को गलत राह पर न जाने दे तथा गुरु का कर्त्तव्य है कि वह अपने शिष्य को पाप कर्म न करने दे। यदि वे ऐसा नहीं करते तो राजा को प्रजा का, पुरोहित को राजा का, पति को पत्नी का और गुरु को अपने शिष्य का पाप स्वयं भुगतना पड़ता है। ऋणकर्ता पिता शत्रुः माता च व्यभिचारिणी। भार्या रूपवती शत्रुः पुत्रः शत्रुरपण्डितः॥ कर्जदार पिता शत्रु है, व्यभिचारिणी माता शत्रु है, मूर्ख लड़का शत्रु है और सुंदर स्त्री शत्रु है।।11।। जो पिता अपनी संतान पर अपना कर्ज छोड़कर जाता है, वह शत्रु के समान है, जो माता पतन के मार्ग पर चल रही है, वह संतान के लिए शत्रु है, जो स्त्री सुंदर है, उसकी रक्षा में पति को बहुत कठिनाई झेलनी पड़ती है क्योंकि सभी की कुदृष्टि उस पर रहती है और यदि संतान ही मूर्ख है तो वह माता-पिता के लिए शत्रु से कम नहीं होती। 76 CC0. Vashishtha Tripathi Collection Digitized by eGangotri
लुब्धमर्थेन गृह्णीयात् स्तब्धमञ्जलिकर्मणा। मूर्खं छन्दोनुवृत्तेन यथार्थत्वेन पण्डितम्॥ लोभी को धन से, घमंडी को हाथ जोड़कर, मूर्ख को उसके अनुसार व्यवहार से और पंडित को सच्चाई से वश में करना चाहिए।।12।। लोभी व्यक्ति धन का लालची होता है। अहंकारी व्यक्ति अपने अहंकार की संतुष्टि चाहता है। उसे नम्रता से वश में करना चाहिए। मूर्ख व्यक्ति की इच्छानुसार कार्य करके, उसे बहला-फुसलाकर वश में करना चाहिए और विद्वान व्यक्ति के सम्मुख कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए। उसे सच्चाई से ही वश में करना चाहिए। वरं न राज्यं न कुराज्यराज्यं, वरं न मित्रं न कुमित्रमित्रम्। वरं न शिष्यो न कुशिष्योशिष्यो, वरं न दारा न कुदारदाराः॥ बिना राज्य के रहना उत्तम है, परंतु दुष्ट राजा के राज्य में रहना अच्छा नहीं है। बिना मित्र के रहना अच्छा है, किंतु दुष्ट मित्र के साथ रहना उचित नहीं है। बिना शिष्य के रहना ठीक है, परंतु नीच शिष्य को ग्रहण करना ठीक नहीं है। बिना स्त्री के रहना उचित है, किंतु दुष्ट और कुलटा स्त्री के साथ रहना उचित नहीं है।। 13।। चाणक्य का कहना है कि ऐसे राज्य में निवास करना चाहिए जहां का राजा न्यायप्रिय और संवेदनशील हो, जहां सहृदय मित्रों का वास हो, जहां शिक्षा का समुचित प्रबंध हो और जहां की नारियां स्नेहयुक्त व्यवहार में पारंगत हो। कुराजराज्येन कुतः प्रजासुखं, कुमित्रमित्रेण कुतो निवृत्तिः। कुदारदारैश्च कुतो गृहे रतिः, कुशिष्यमध्यापयतः कुतो यशः॥ दुष्ट राजा के राज्य में प्रजा को सुख कहां? दुष्ट मित्र से 77 CC0. Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
शान्ति कहां? दुष्ट स्त्रियों से घर में सुख कहां? दुष्ट विद्यार्थियों को पढ़ाने से यश कहां? अर्थात् ये सभी दुःख देने वाले हैं। इनसे सदैव अपना बचाव करना चाहिए।।14।। प्रस्तुत श्लोक में चाणक्य ने इससे पूर्व के श्लोक जैसी बात कही है। इस श्लोक में उन्होंने राजा, मित्र, स्त्री और शिष्य की परिभाषा को और भी स्पष्ट कर दिया है। उन्होंने बताया है कि दुष्ट राजा के राज्य में नहीं रहना चाहिए क्योंकि उसके राज्य में प्रजा को सुख प्राप्त नहीं हो सकते। अपने दुष्ट आचरण से वह प्रजा के सामने कोई-न-कोई विपत्तियां ही खड़ा करता रहेगा। इसी तरह दुष्ट मित्र के साथ की गई मित्रता कभी किसी का कल्याण नहीं कर सकती, दुराचारिणी स्त्री को पत्नी बनाने से गृहस्थ का आनंद जाता रहता है। दुष्ट व्यक्ति को विद्या दान देकर यश की आशा करना व्यर्थ है। सिंहादेकं बकादेकं शिक्षेच्चत्वारि कुक्कुटात्। वायसात्पंच शिक्षेच्च षट्-शुनस्त्रीणि गर्दभात्॥ सिंह (शेर) और बगुले से एक-एक, गधे से तीन, मुर्गे से चार, कौए से पांच और कुत्ते से छः गुण (मनुष्य को) सीखने चाहिए।।15।। इस श्लोक का मूल भाव यह है कि मनुष्य को जो अच्छी बात, जो सद्गुण जहां से भी मिलें, वे ग्रहण कर लेने चाहिए। इनका उल्लेख आगे के पांच श्लोकों में किया गया है। प्रभूतं कार्यमल्पं वा यन्नरः कर्तुमिच्छति। सर्वारम्भेण तत्कार्यं सिंहादेकं प्रचक्षते॥ काम छोटा हो या बड़ा, उसे एक बार हाथ में लेने के बाद छोड़ना नहीं चाहिए। उसे पूरी लगन और सामर्थ्य के साथ करना चाहिए। जैसे सिंह पकड़े हुए शिकार को कदापि नहीं 78
छोड़ता। सिंह का यह एक गुण अवश्य लेना चाहिए।।16।। आचार्य चाणक्य ने उपरोक्त श्लोक के माध्यम से कहा है कि मनुष्य को चाहिए कि वह जो भी कार्य करे उसे पूरी शक्ति और लगन लगाकर करे। पूरा साहस और सामर्थ्य लगा दे। कार्य करते समय इस बात को न देखे कि कार्य बहुत छोटा है, उसे तो बस यूं ही कर लेंगे। यह अवस्था आलस्य की होती है। सिंह को हमला चाहे हाथी पर करना हो या फिर किसी मृग पर वह एक-सी आक्रामक मुद्रा अपनाकर, एक-से साहस और वीरता के साथ हमला करता है। यद्यपि हाथी और मृग पर हमलावर के उद्देश्य अलग-अलग होते हैं। हाथी को बलशाली शत्रु मानकर उसे चोट पहुंचाने के लिए हमला करता है, पर मृग को अपना शिकार समझकर आक्रमण करता है, दोनों में वह एकरसता रखता है। इन्द्रियाणि च संयम्य बकवत् पण्डितो नरः। देशकालबलं ज्ञात्वा सर्वकार्याणि साधयेत्॥ सफल व्यक्ति वही है जो बगुले के समान अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियों को संयम में रखकर अपना शिकार करता है। उसी के अनुसार देश, काल और अपनी सामर्थ्य को अच्छी प्रकार से समझकर अपने सभी कार्यों को करना चाहिए। बगुले से यह एक गुण ग्रहण करना चाहिए, अर्थात एकाग्रता के साथ अपना कार्य करें तो सफलता अवश्य प्राप्त होगी, अर्थात कार्य को करते वक्त अपना सारा ध्यान उसी कार्य की ओर लगाना चाहिए, तभी सफलता मिलेगी।।17।। आचार्य चाणक्य ने उपरोक्त श्लोक के माध्यम से बताया है कि कार्यसिद्धि करने के लिए जहां एकाग्रचित्तता और 79