सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलुब्धमर्थेन गृह्णीयात् स्तब्धमञ्जलिकर्मणा। मूर्खं छन्दोनुवृत्तेन यथार्थत्वेन पण्डितम्॥ लोभी को धन से, घमंडी को हाथ जोड़कर, मूर्ख को उसके अनुसार व्यवहार से और पंडित को सच्चाई से वश में करना चाहिए।।12।। लोभी व्यक्ति धन का लालची होता है। अहंकारी व्यक्ति अपने अहंकार की संतुष्टि चाहता है। उसे नम्रता से वश में करना चाहिए। मूर्ख व्यक्ति की इच्छानुसार कार्य करके, उसे बहला-फुसलाकर वश में करना चाहिए और विद्वान व्यक्ति के सम्मुख कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए। उसे सच्चाई से ही वश में करना चाहिए। वरं न राज्यं न कुराज्यराज्यं, वरं न मित्रं न कुमित्रमित्रम्। वरं न शिष्यो न कुशिष्योशिष्यो, वरं न दारा न कुदारदाराः॥ बिना राज्य के रहना उत्तम है, परंतु दुष्ट राजा के राज्य में रहना अच्छा नहीं है। बिना मित्र के रहना अच्छा है, किंतु दुष्ट मित्र के साथ रहना उचित नहीं है। बिना शिष्य के रहना ठीक है, परंतु नीच शिष्य को ग्रहण करना ठीक नहीं है। बिना स्त्री के रहना उचित है, किंतु दुष्ट और कुलटा स्त्री के साथ रहना उचित नहीं है।। 13।। चाणक्य का कहना है कि ऐसे राज्य में निवास करना चाहिए जहां का राजा न्यायप्रिय और संवेदनशील हो, जहां सहृदय मित्रों का वास हो, जहां शिक्षा का समुचित प्रबंध हो और जहां की नारियां स्नेहयुक्त व्यवहार में पारंगत हो। कुराजराज्येन कुतः प्रजासुखं, कुमित्रमित्रेण कुतो निवृत्तिः। कुदारदारैश्च कुतो गृहे रतिः, कुशिष्यमध्यापयतः कुतो यशः॥ दुष्ट राजा के राज्य में प्रजा को सुख कहां? दुष्ट मित्र से 77 CC0. Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri