सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऔर जब उन कर्मों का अच्छा-बुरा फल उसे भुगतना पड़ता है, तब वह संसार की मोह-माया से मुक्त होने के लिए छटपटाता है और परमात्मा को याद करके इस जंजाल से निकलना चाहता है। राजा राष्ट्रकृतं पापं राज्ञः पापं पुरोहितः। भर्ता च स्त्रीकृतं पापं शिष्यपापं गुरुस्तथा॥ राजा अपनी प्रजा के द्वारा किए गए पाप को, पुरोहित राजा के पाप को, पति अपनी पत्नी के द्वारा किए गए पाप को और गुरु अपने शिष्य के पाप को भोगता है।।10।। राजा का कर्त्तव्य है कि वह अपनी प्रजा को पाप कर्म की ओर न बढ़ने दे, पुरोहित अथवा मंत्री का कर्त्तव्य है कि वह राजा को पाप की ओर प्रवृत्त न होने दे और इसी तरह पति का कर्त्तव्य है कि वह अपनी पत्नी को गलत राह पर न जाने दे तथा गुरु का कर्त्तव्य है कि वह अपने शिष्य को पाप कर्म न करने दे। यदि वे ऐसा नहीं करते तो राजा को प्रजा का, पुरोहित को राजा का, पति को पत्नी का और गुरु को अपने शिष्य का पाप स्वयं भुगतना पड़ता है। ऋणकर्ता पिता शत्रुः माता च व्यभिचारिणी। भार्या रूपवती शत्रुः पुत्रः शत्रुरपण्डितः॥ कर्जदार पिता शत्रु है, व्यभिचारिणी माता शत्रु है, मूर्ख लड़का शत्रु है और सुंदर स्त्री शत्रु है।।11।। जो पिता अपनी संतान पर अपना कर्ज छोड़कर जाता है, वह शत्रु के समान है, जो माता पतन के मार्ग पर चल रही है, वह संतान के लिए शत्रु है, जो स्त्री सुंदर है, उसकी रक्षा में पति को बहुत कठिनाई झेलनी पड़ती है क्योंकि सभी की कुदृष्टि उस पर रहती है और यदि संतान ही मूर्ख है तो वह माता-पिता के लिए शत्रु से कम नहीं होती। 76 CC0. Vashishtha Tripathi Collection Digitized by eGangotri