भारतकोश
सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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वृथा वृष्टिः समुद्रेषु वृथा तृप्तेषु भोजनम्। वृथा दानं धनाढ्येषु वृथा दीपो दिवाऽपि च॥ समुद्र में वर्षा का होना व्यर्थ है, तृप्त व्यक्ति को भोजन कराना व्यर्थ है, धनिक को दान देना व्यर्थ है और दिन में दीपक जलाना व्यर्थ है।।16।। वर्षा की जरूरत सूखे मैदानों और कृषि के लिए खेतों में अधिक होती है, भोजन की जरूरत भूखे व्यक्ति के लिए होती है। दान की जरूरत निर्धन के लिए होती है और दीपक की जरूरत रात्रि का अंधकार दूर करने के लिए होती है। नोट—समुद्र में वर्षा, तृप्त व्यक्ति को भोजन खिलाना, धनवान को दान देना और दिन के प्रकाश में दीपक जलाना, ये सभी कार्य निरर्थक हैं, व्यर्थ हैं। नाऽस्ति मेघसमं तोयं नाऽस्ति चात्मसमं बलम्। नाऽस्ति चक्षुःसमं तेजो नाऽस्ति धान्यसमं प्रियम्॥ बादल के जल के समान दूसरा जल नहीं है, आत्मबल के समान दूसरा बल नहीं है, अपनी आंखों के समान दूसरा प्रकाश नहीं है और अन्न के समान दूसरा प्रिय पदार्थ नहीं है।।17।। बादलों का जल सर्वाधिक स्वच्छ और स्वास्थ्यवर्धक होता है। आदमी का आत्म बल सभी शक्तियों से ऊपर होता है। आत्मबल हो तो मनुष्य कठिन-से-कठिन संकट व परिस्थितियों का भी हंसते-हंसते सामना कर लेता है तथा सफलता को प्राप्त करता है। जिन नेत्रों में ज्योति है, वे ही बाहरी प्रकाश और सौंदर्य का पान कर सकते हैं और बिना अन्न के जीवन की सुरक्षा असंभव है। 69 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri