सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञान इस हद तक सीखना चाहिए कि वह बह्मज्ञानी बन जाए। यदि मनुष्य शूरवीर है तो उसे जीवन का मोह नहीं होता, क्योंकि उसका जन्म ही वीरता दिखाते हुए प्रोणोत्सर्ग कर देने के लिए हुआ है। इंद्रियों को वश में रखने वाले के लिए स्त्री का कोई महत्त्व नहीं, वह तो उसके लिए तृण के समान है। इसी तरह जिसे लोभ नहीं उसके लिए संसार का कोई मोह नहीं हो सकता। विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च। व्याधितस्यौषधं मित्रं धर्मो मित्रं मृतस्य च॥ प्रवास (विदेश) में विद्या ही मित्र होती है, घर में पत्नी मित्र होती है, रोगियों के लिए औषधि मित्र है और मरते हुए व्यक्ति का मित्र धर्म होता है अर्थात उसके सत्कर्म होते हैं, इसीलिए विद्या, पतिव्रता विदुषी स्त्री, रोग के समय उचित औषधि और मृत्यु काल निकट आने पर व्यक्ति के सत्कर्म ही उसका साथ देते हैं॥15॥ आचार्य चाणक्य के उपरोक्त श्लोक के संदर्भ में विद्या के लिए कहा गया है कि विद्या कामधेनु के समान गुणों से युक्त है। यह असमय फल देने वाली है। यह प्रवास में माता के समान हितकारिणी और रक्षिका है। विद्या को गुप्त धन माना गया है। पत्नी पुरुष का आधा अंग है। पत्नी पति की सर्वश्रेष्ठ मित्र होती है। पत्नी धर्म, अर्थ और काम का मूल होती है। यहां तक कि भवसागर पार उतरने की इच्छा वाले पुरुष की सहयोगी होती है। रोगी के लिए औषध और मृत्यु के बाद उसके अच्छे कर्म मनुष्य के साथी होते हैं। CCO. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri 68