सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
ज्ञान इस हद तक सीखना चाहिए कि वह बह्मज्ञानी बन जाए। यदि मनुष्य शूरवीर है तो उसे जीवन का मोह नहीं होता, क्योंकि उसका जन्म ही वीरता दिखाते हुए प्रोणोत्सर्ग कर देने के लिए हुआ है। इंद्रियों को वश में रखने वाले के लिए स्त्री का कोई महत्त्व नहीं, वह तो उसके लिए तृण के समान है। इसी तरह जिसे लोभ नहीं उसके लिए संसार का कोई मोह नहीं हो सकता। विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च। व्याधितस्यौषधं मित्रं धर्मो मित्रं मृतस्य च॥ प्रवास (विदेश) में विद्या ही मित्र होती है, घर में पत्नी मित्र होती है, रोगियों के लिए औषधि मित्र है और मरते हुए व्यक्ति का मित्र धर्म होता है अर्थात उसके सत्कर्म होते हैं, इसीलिए विद्या, पतिव्रता विदुषी स्त्री, रोग के समय उचित औषधि और मृत्यु काल निकट आने पर व्यक्ति के सत्कर्म ही उसका साथ देते हैं॥15॥ आचार्य चाणक्य के उपरोक्त श्लोक के संदर्भ में विद्या के लिए कहा गया है कि विद्या कामधेनु के समान गुणों से युक्त है। यह असमय फल देने वाली है। यह प्रवास में माता के समान हितकारिणी और रक्षिका है। विद्या को गुप्त धन माना गया है। पत्नी पुरुष का आधा अंग है। पत्नी पति की सर्वश्रेष्ठ मित्र होती है। पत्नी धर्म, अर्थ और काम का मूल होती है। यहां तक कि भवसागर पार उतरने की इच्छा वाले पुरुष की सहयोगी होती है। रोगी के लिए औषध और मृत्यु के बाद उसके अच्छे कर्म मनुष्य के साथी होते हैं। CCO. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri 68
वृथा वृष्टिः समुद्रेषु वृथा तृप्तेषु भोजनम्। वृथा दानं धनाढ्येषु वृथा दीपो दिवाऽपि च॥ समुद्र में वर्षा का होना व्यर्थ है, तृप्त व्यक्ति को भोजन कराना व्यर्थ है, धनिक को दान देना व्यर्थ है और दिन में दीपक जलाना व्यर्थ है।।16।। वर्षा की जरूरत सूखे मैदानों और कृषि के लिए खेतों में अधिक होती है, भोजन की जरूरत भूखे व्यक्ति के लिए होती है। दान की जरूरत निर्धन के लिए होती है और दीपक की जरूरत रात्रि का अंधकार दूर करने के लिए होती है। नोट—समुद्र में वर्षा, तृप्त व्यक्ति को भोजन खिलाना, धनवान को दान देना और दिन के प्रकाश में दीपक जलाना, ये सभी कार्य निरर्थक हैं, व्यर्थ हैं। नाऽस्ति मेघसमं तोयं नाऽस्ति चात्मसमं बलम्। नाऽस्ति चक्षुःसमं तेजो नाऽस्ति धान्यसमं प्रियम्॥ बादल के जल के समान दूसरा जल नहीं है, आत्मबल के समान दूसरा बल नहीं है, अपनी आंखों के समान दूसरा प्रकाश नहीं है और अन्न के समान दूसरा प्रिय पदार्थ नहीं है।।17।। बादलों का जल सर्वाधिक स्वच्छ और स्वास्थ्यवर्धक होता है। आदमी का आत्म बल सभी शक्तियों से ऊपर होता है। आत्मबल हो तो मनुष्य कठिन-से-कठिन संकट व परिस्थितियों का भी हंसते-हंसते सामना कर लेता है तथा सफलता को प्राप्त करता है। जिन नेत्रों में ज्योति है, वे ही बाहरी प्रकाश और सौंदर्य का पान कर सकते हैं और बिना अन्न के जीवन की सुरक्षा असंभव है। 69 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
अधना धनमिच्छन्ति वाचं चैव चतुष्पदाः। मानवाः स्वर्गमिच्छन्ति मोक्षमिच्छन्ति देवताः॥ निर्धन धन चाहते हैं, पशु वाणी चाहते हैं। मनुष्य स्वर्ग की इच्छा करते हैं और देवगण मोक्ष चाहते हैं॥18॥ संसार में सभी प्राणी किसी-न-किसी अभाव से ग्रस्त रहते हैं। इस अभाव को मिटाने के लिए वे प्रयत्न करते हैं। प्रायः जिस प्राणी के पास जिस वस्तु का अभाव होता है, वह उसी को पाना चाहता है। सत्येन धार्यते पृथिवी सत्येन तपते रविः। सत्येन वाति वायुश्च सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम्॥ सत्य पर पृथ्वी टिकी है, सत्य से सूर्य तपता है, सत्य से वायु बहती है, संसार के सभी पदार्थ सत्य में निहित हैं॥19॥ यहां सत्य की महत्ता का प्रतिपादन करते हुए आचार्य चाणक्य कहते हैं कि यह समस्त पृथ्वी, हवा की गति, सूर्य की तपिश और संपूर्ण ब्रह्मांड सत्य में ही समाया हुआ है। सत्य के द्वारा ही सारा ब्रह्मांड चलाया जाता है और कहा भी गया है 'सत्यं शिवं सुन्दरम्।' अर्थात सत्य ही सबसे बड़ा धर्म है, सत्य से बढ़कर कुछ भी नहीं है। चला लक्ष्मीश्चलाः प्राणाश्चलं जीवित-यौवनं। चलाचले च संसारे धर्म एको हि निश्चलः॥ लक्ष्मी अनित्य और अस्थिर है, प्राण भी अनित्य है और जीवन भी अनित्य है। इस चलते-फिरते संसार में केवल धर्म ही स्थिर है॥20॥ इस संसार में केवल धर्म ही ऐसा है जो स्थिर रूप से मानव हृदय में रहता है। इसके अलावा समृद्धि (धन-सम्पत्ति), 70
जीवन और सभी चराचर पदार्थ समय आने पर नष्ट हो जाने वाले हैं, लेकिन धर्म अजर-अमर है। मनुष्य का सभी करा-धरा यहीं रह जाएगा, केवल धर्म ही उसके साथ जाएगा। अतः धर्म का संग्रह करना ही श्रेष्ठ है। नराणां नापितो धूर्तः पक्षिणां चैव वायसः। चतुष्पदां शृगालस्तु स्त्रीणां धूर्ता च मालिनी॥ पुरुषों में नाई धूर्त होता है, पक्षियों में कौवा, पशुओं में गीदड़ और स्त्रियों में मालिन धूर्त होती है।।21।। ये चारों सदैव दूसरों के कार्य को बिगाड़ने वाले होते हैं। जनिता चोपनेता च यस्तु विद्यां प्रयच्छति। अन्नदाता भयत्राता पञ्चैते पितरः स्मृताः॥ मनुष्य को जन्म देने वाला, यज्ञोपवीत संस्कार कराने वाला पुरोहित, विद्या देने वाला आचार्य, अन्न देने वाला, भय से मुक्ति दिलाने वाला अथवा रक्षा करने वाला, ये पांच पिता कहे गए हैं।।22।। पिता जीवन देता है, पुरोहित समाज में प्रतिष्ठित करने के लिए यज्ञोपवीत संस्कार कराता है, आचार्य ज्ञान देकर जीवन और जगत के समस्त कार्य-व्यापार से परिचित कराता है, अन्न उत्पन्न करने वाला कृषक हमारे लिए भोजन की व्यवस्था करता है और राजा हमारी शत्रु से रक्षा करके हमें भयमुक्त करता है। अतः समाज ने इन्हें पिता अर्थात-पालन करने वाले का उच्च स्थान दिया है। 71 CC0. Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
॥ अथ षष्ठम अध्याय ॥ श्रुत्वा धर्मं विजानाति श्रुत्वा त्यजति दुर्मतिम्। श्रुत्वा ज्ञानमवाप्नोति श्रुत्वा मोक्षमवाप्नुयात्॥ मनुष्य शास्त्रों को पढ़कर धर्म को जानता है और मूर्खता को त्यागकर ज्ञान प्राप्त करता है तथा शास्त्रों को सुनकर मोक्ष प्राप्त करता है॥1॥ धर्मोपदेशक के प्रवचन सुनकर ही बहुत-से भक्तजन अपना जीवन संवार लेते हैं। गुरु भी जब शिक्षा देता है, तब वह अपने शिष्यों को बोलकर ही विद्यादान देता है और शिष्य श्रवण करके ही ज्ञान प्राप्त करते हैं। पक्षिणां काकश्चाण्डालः पशूनां चैव कुक्कुरः। मुनीनां कोपीचाण्डालः सर्वेषां चैव निन्दकः॥ पक्षियों में कौआ, पशुओं में कुत्ता, ऋषि-मुनियों में क्रोध करने वाला और मनुष्यों में चुगली करने वाला चांडाल अर्थात नीच होता है॥2॥ पापकर्म व चुगली करना मानव-जीवन के दोष माने गए हैं। इन्हें करने वाला मनुष्य ऋषि-मुनि होने पर भी चांडाल होता है, जैसे
पक्षियों में कौए और पशुओं में कुत्ते को नीच माना गया है। भस्मना शुद्ध्यते कांस्यं ताम्रमम्लेन शुद्ध्यते। रजसा शुद्ध्यते नारी नदी वेगेन शुद्ध्यति॥ कांसे का पात्र राख द्वारा मांजने से शुद्ध होता है, तांबे का पात्र खटाई के रगड़ने से शुद्ध होता है। स्त्री रजस्वला होने से पवित्र होती है और नदी तीव्र गति से बहने से निर्मल हो जाती है॥३॥ हर वस्तु और प्राणी की अपनी-अपनी प्रवृत्ति है। नदी का पानी यदि रुक जाए तो वह नदी नहीं रहती। उसका रुका हुआ पानी गंदा हो जाता है। पानी जब वेग से बहता है, तभी वह शुद्ध होता है। इसी प्रकार रजस्वला होने के बाद ही स्त्री गर्भ धारण करने योग्य बनती है और तांबे के बर्तन को अम्ल (खटाई) से और कांसे के बर्तन को राख से मांजकर शुद्ध किया जा सकता है। किसी मनुष्य की गंदी आदतों को शुद्ध करने के लिए इसी भांति साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपनानी चाहिए, ऐसा आचार्य चाणक्य का मत है। भ्रमन् सम्पूज्यते राजा भ्रमन् सम्पूज्यते द्विजः। भ्रमन् सम्पूज्यते योगी भ्रमन्ती स्त्री भ्रमन्ती विनश्यति॥ प्रजा की रक्षा के लिए भ्रमण करने वाला राजा सम्मानित होता है, भ्रमण करने वाला योगी और ब्राह्मण सम्मानित होता है, किन्तु इधर-उधर घूमने वाली स्त्री भ्रष्ट होकर नष्ट हो जाती है॥४॥ जो राजा प्रजा के सुख-दुख में सम्मिलित होकर उनकी परेशानियों को दूर करता है, प्रजा उस राजा का सदैव आदर करती है। इसी प्रकार जो योगी और ब्राह्मण प्रजा के हित में भ्रमण करते रहते हैं और उनके सभी धार्मिक, सामाजिक आर्थिक कार्यों में उनकी मंगलकामना करते हैं, लोग 73 CCO. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
अध्याय ७-९: बुद्धि-कौशल, मित्र-परीक्षा व राजा-प्रजा
उनका सम्मान करते हैं, उन्हें पूज्य मानते हैं परंतु इधर-उधर भटकने वाली स्त्री पतित होकर नष्ट हो जाती है। यस्याऽर्थास्तस्य मित्राणि यस्याऽर्थास्तस्य बांधवाः। यस्याऽर्थाः स पुमांल्लोके यस्याऽर्थाः स च पण्डितः॥ जिसके पास धन है उसके अनेक मित्र होते हैं, उसी के अनेक बंधु-बांधव होते हैं, वही पुरुष कहलाता है और वही पंडित कहलाता है॥5॥ धन का महत्त्व इतना बड़ा है कि जिसके पास यह होता है, सब उसे ही महापुरुष, पंडित (विद्वान) और सबका हितैषी मानने लगते हैं। सब उससे मित्रता करना चाहते हैं और उससे संबंध बनाना चाहते हैं। उसके सभी दोष, अवगुण और व्यसन पैसे की चकाचौंध के सामने छिप जाते हैं। तादृशी जायते बुद्धिव्यवसायोऽपि तादृशः। सहायास्तादृशा एव यादृशी भवितव्यता॥ जैसी होनहार होती है, वैसी ही बुद्धि हो जाती है, उद्योग-धंधा भी वैसा ही हो जाता है और सहायक भी वैसे ही मिल जाते हैं॥6॥ 'होनी बलवान है' यह मुहावरा काफी प्रचलित है। आदमी के भाग्य में जो लिखा है, वह होकर ही रहता है। उसी के अनुसार सारे बानक बनते चले जाते हैं। आदमी कुछ नहीं करता, उसका भाग्य ही सब कुछ करता है। कालः पचति भूतानि कालः संहरते प्रजाः। कालः सुप्तेषु जागर्ति कालो हि दुरतिक्रमः॥ काल (समय, मृत्यु) ही पंच भूतों (पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश) को पचाता है और सब प्राणियों 74 CC0 Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
का संहार भी काल ही करता है। संसार में प्रलय हो जाने पर वह सुप्तावस्था अर्थात स्वप्नवत रहता है। काल की सीमा को निश्चय ही कोई भी लांघ नहीं सकता॥7॥ काल की गति को कोई रोक नहीं सकता। समय चक्र में आकर सभी को एक-न-एक दिन नष्ट होना पड़ता है। काल की गति जीवन से मृत्यु तक शाश्वत है, सनातन है। इससे बचना असंभव है। यह किसी को नहीं छोड़ता। न पश्यति च जन्मान्धः कामान्धो नैव पश्यति। न पश्यति मदोन्मत्तोः ह्यर्थी दोषान् न पश्यति॥ जन्म से अंधे को कुछ दिखाई नहीं देता, काम में आसक्त व्यक्ति को भला-बुरा कुछ सुझाई नहीं देता, मद से मतवाला बना प्राणी कुछ सोच नहीं पाता और अपनी जरूरत को सिद्ध करने वाला दोष नहीं देखा करता॥8॥ धन और शक्ति के अहंकार से भरा व्यक्ति अपना विवेक खो बैठता है। उसे केवल अपना स्वार्थ ही सर्वोपरि दिखाई देता है। उसकी दशा उस अंधे के समान होती है, जो जन्म से अंधा होता है। स्वयं कर्म करोत्यात्मा स्वयं तत्फलमश्नुते। स्वयं भ्रमति संसारे स्वयं तस्माद् द्विमुच्यते॥ जीव स्वयं ही (नाना प्रकार के अच्छे-बुरे) कर्म करता है, उसका फल भी स्वयं ही भोगता है। वह स्वयं ही संसार की मोह-माया में फंसता है और स्वयं ही इसे त्यागता है॥9॥ वस्तुतः मनुष्य के हाथों में कुछ नहीं है। ईश्वर की प्रेरणा से वह संसार में रहते हुए नाना प्रकार के कर्मों में फंसता है 75
और जब उन कर्मों का अच्छा-बुरा फल उसे भुगतना पड़ता है, तब वह संसार की मोह-माया से मुक्त होने के लिए छटपटाता है और परमात्मा को याद करके इस जंजाल से निकलना चाहता है। राजा राष्ट्रकृतं पापं राज्ञः पापं पुरोहितः। भर्ता च स्त्रीकृतं पापं शिष्यपापं गुरुस्तथा॥ राजा अपनी प्रजा के द्वारा किए गए पाप को, पुरोहित राजा के पाप को, पति अपनी पत्नी के द्वारा किए गए पाप को और गुरु अपने शिष्य के पाप को भोगता है।।10।। राजा का कर्त्तव्य है कि वह अपनी प्रजा को पाप कर्म की ओर न बढ़ने दे, पुरोहित अथवा मंत्री का कर्त्तव्य है कि वह राजा को पाप की ओर प्रवृत्त न होने दे और इसी तरह पति का कर्त्तव्य है कि वह अपनी पत्नी को गलत राह पर न जाने दे तथा गुरु का कर्त्तव्य है कि वह अपने शिष्य को पाप कर्म न करने दे। यदि वे ऐसा नहीं करते तो राजा को प्रजा का, पुरोहित को राजा का, पति को पत्नी का और गुरु को अपने शिष्य का पाप स्वयं भुगतना पड़ता है। ऋणकर्ता पिता शत्रुः माता च व्यभिचारिणी। भार्या रूपवती शत्रुः पुत्रः शत्रुरपण्डितः॥ कर्जदार पिता शत्रु है, व्यभिचारिणी माता शत्रु है, मूर्ख लड़का शत्रु है और सुंदर स्त्री शत्रु है।।11।। जो पिता अपनी संतान पर अपना कर्ज छोड़कर जाता है, वह शत्रु के समान है, जो माता पतन के मार्ग पर चल रही है, वह संतान के लिए शत्रु है, जो स्त्री सुंदर है, उसकी रक्षा में पति को बहुत कठिनाई झेलनी पड़ती है क्योंकि सभी की कुदृष्टि उस पर रहती है और यदि संतान ही मूर्ख है तो वह माता-पिता के लिए शत्रु से कम नहीं होती। 76 CC0. Vashishtha Tripathi Collection Digitized by eGangotri
लुब्धमर्थेन गृह्णीयात् स्तब्धमञ्जलिकर्मणा। मूर्खं छन्दोनुवृत्तेन यथार्थत्वेन पण्डितम्॥ लोभी को धन से, घमंडी को हाथ जोड़कर, मूर्ख को उसके अनुसार व्यवहार से और पंडित को सच्चाई से वश में करना चाहिए।।12।। लोभी व्यक्ति धन का लालची होता है। अहंकारी व्यक्ति अपने अहंकार की संतुष्टि चाहता है। उसे नम्रता से वश में करना चाहिए। मूर्ख व्यक्ति की इच्छानुसार कार्य करके, उसे बहला-फुसलाकर वश में करना चाहिए और विद्वान व्यक्ति के सम्मुख कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए। उसे सच्चाई से ही वश में करना चाहिए। वरं न राज्यं न कुराज्यराज्यं, वरं न मित्रं न कुमित्रमित्रम्। वरं न शिष्यो न कुशिष्योशिष्यो, वरं न दारा न कुदारदाराः॥ बिना राज्य के रहना उत्तम है, परंतु दुष्ट राजा के राज्य में रहना अच्छा नहीं है। बिना मित्र के रहना अच्छा है, किंतु दुष्ट मित्र के साथ रहना उचित नहीं है। बिना शिष्य के रहना ठीक है, परंतु नीच शिष्य को ग्रहण करना ठीक नहीं है। बिना स्त्री के रहना उचित है, किंतु दुष्ट और कुलटा स्त्री के साथ रहना उचित नहीं है।। 13।। चाणक्य का कहना है कि ऐसे राज्य में निवास करना चाहिए जहां का राजा न्यायप्रिय और संवेदनशील हो, जहां सहृदय मित्रों का वास हो, जहां शिक्षा का समुचित प्रबंध हो और जहां की नारियां स्नेहयुक्त व्यवहार में पारंगत हो। कुराजराज्येन कुतः प्रजासुखं, कुमित्रमित्रेण कुतो निवृत्तिः। कुदारदारैश्च कुतो गृहे रतिः, कुशिष्यमध्यापयतः कुतो यशः॥ दुष्ट राजा के राज्य में प्रजा को सुख कहां? दुष्ट मित्र से 77 CC0. Vasisntha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
शान्ति कहां? दुष्ट स्त्रियों से घर में सुख कहां? दुष्ट विद्यार्थियों को पढ़ाने से यश कहां? अर्थात् ये सभी दुःख देने वाले हैं। इनसे सदैव अपना बचाव करना चाहिए।।14।। प्रस्तुत श्लोक में चाणक्य ने इससे पूर्व के श्लोक जैसी बात कही है। इस श्लोक में उन्होंने राजा, मित्र, स्त्री और शिष्य की परिभाषा को और भी स्पष्ट कर दिया है। उन्होंने बताया है कि दुष्ट राजा के राज्य में नहीं रहना चाहिए क्योंकि उसके राज्य में प्रजा को सुख प्राप्त नहीं हो सकते। अपने दुष्ट आचरण से वह प्रजा के सामने कोई-न-कोई विपत्तियां ही खड़ा करता रहेगा। इसी तरह दुष्ट मित्र के साथ की गई मित्रता कभी किसी का कल्याण नहीं कर सकती, दुराचारिणी स्त्री को पत्नी बनाने से गृहस्थ का आनंद जाता रहता है। दुष्ट व्यक्ति को विद्या दान देकर यश की आशा करना व्यर्थ है। सिंहादेकं बकादेकं शिक्षेच्चत्वारि कुक्कुटात्। वायसात्पंच शिक्षेच्च षट्-शुनस्त्रीणि गर्दभात्॥ सिंह (शेर) और बगुले से एक-एक, गधे से तीन, मुर्गे से चार, कौए से पांच और कुत्ते से छः गुण (मनुष्य को) सीखने चाहिए।।15।। इस श्लोक का मूल भाव यह है कि मनुष्य को जो अच्छी बात, जो सद्गुण जहां से भी मिलें, वे ग्रहण कर लेने चाहिए। इनका उल्लेख आगे के पांच श्लोकों में किया गया है। प्रभूतं कार्यमल्पं वा यन्नरः कर्तुमिच्छति। सर्वारम्भेण तत्कार्यं सिंहादेकं प्रचक्षते॥ काम छोटा हो या बड़ा, उसे एक बार हाथ में लेने के बाद छोड़ना नहीं चाहिए। उसे पूरी लगन और सामर्थ्य के साथ करना चाहिए। जैसे सिंह पकड़े हुए शिकार को कदापि नहीं 78
छोड़ता। सिंह का यह एक गुण अवश्य लेना चाहिए।।16।। आचार्य चाणक्य ने उपरोक्त श्लोक के माध्यम से कहा है कि मनुष्य को चाहिए कि वह जो भी कार्य करे उसे पूरी शक्ति और लगन लगाकर करे। पूरा साहस और सामर्थ्य लगा दे। कार्य करते समय इस बात को न देखे कि कार्य बहुत छोटा है, उसे तो बस यूं ही कर लेंगे। यह अवस्था आलस्य की होती है। सिंह को हमला चाहे हाथी पर करना हो या फिर किसी मृग पर वह एक-सी आक्रामक मुद्रा अपनाकर, एक-से साहस और वीरता के साथ हमला करता है। यद्यपि हाथी और मृग पर हमलावर के उद्देश्य अलग-अलग होते हैं। हाथी को बलशाली शत्रु मानकर उसे चोट पहुंचाने के लिए हमला करता है, पर मृग को अपना शिकार समझकर आक्रमण करता है, दोनों में वह एकरसता रखता है। इन्द्रियाणि च संयम्य बकवत् पण्डितो नरः। देशकालबलं ज्ञात्वा सर्वकार्याणि साधयेत्॥ सफल व्यक्ति वही है जो बगुले के समान अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियों को संयम में रखकर अपना शिकार करता है। उसी के अनुसार देश, काल और अपनी सामर्थ्य को अच्छी प्रकार से समझकर अपने सभी कार्यों को करना चाहिए। बगुले से यह एक गुण ग्रहण करना चाहिए, अर्थात एकाग्रता के साथ अपना कार्य करें तो सफलता अवश्य प्राप्त होगी, अर्थात कार्य को करते वक्त अपना सारा ध्यान उसी कार्य की ओर लगाना चाहिए, तभी सफलता मिलेगी।।17।। आचार्य चाणक्य ने उपरोक्त श्लोक के माध्यम से बताया है कि कार्यसिद्धि करने के लिए जहां एकाग्रचित्तता और 79
संयम की आवश्यकता है, वही उसे इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि समय पर परिस्थितियां उस कार्यसिद्धि के लिए अनुकूल हैं अथवा नहीं। फल प्राप्ति की आशा में ध्यान लगाने से पहले देख लेना चाहिए कि वहां फल की संभावना है भी अथवा नहीं। बगुला वहीं ध्यान लगाकर बैठता है जहां मछली मिलने की आशा होती है, अन्यथा उड़कर दूसरी जगह चला जाता है। सुश्रान्तोऽपि वहेद् भारं शीतोष्णं च न पश्यति। सन्तुष्टश्चरते नित्यं त्रीणि शिक्षेच्च गर्दभात्॥ अत्यंत थक जाने पर भी बोझ को ढोना, ठंडे-गर्म का विचार न करना, सदा संतोषपूर्वक विचरण करना, ये तीन बातें गधे से सीखनी चाहिए॥18॥ बुद्धिमान व्यक्ति को कभी भी अपने कर्त्तव्य से विमुख नहीं होना चाहिए। उसे अपने कार्य को बोझ नहीं समझना चाहिए। ऋतुओं के प्रभाव को भी अनदेखा कर देना चाहिए और संतोष के साथ अपने कार्य को करते रहना चाहिए। ये तीन गुण गधे में पाए जाते हैं। प्रत्युत्थानं च युद्धं च संविभागं च बन्धुषु। स्वयमाक्रम्य भुक्तं च शिक्षेच्चत्वारि कुक्कुटात्॥ ब्रह्ममुहूर्त में जागना, रण में पीछे न हटना, बंधुओं में किसी वस्तु का बराबर भाग करना और स्वयं चढ़ाई करके किसी से अपने भक्ष्य को छीन लेना, ये चारों बातें मुर्गे से सीखनी चाहिए। मुर्गे में ये चारों गुण होते हैं। वह सुबह उठकर बांग देता है। दूसरे मुर्गे से लड़ते हुए पीछे नहीं हटता, वह अपने खाद्य को अपने चूजों के साथ बांटकर खाता है और अपनी मुर्गी को समागम में संतुष्ट रखता है॥19॥ 80 सम्पूर्ण चाणक्य नीति-5
आचार्य चाणक्य के उपरोक्त श्लोक में ठीक समय अर्थात प्रातःकाल जागने का गुण सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। अथर्ववेद में कहा गया है, जैसे उदय होता हुआ सूर्य सोते हुए आलसियों के तेज को हर लेता है उसी प्रकार एक वीर शत्रुओं के तेज और बल को खींच लेता है। सूर्योदय के पश्चात सोने वाले आलसी और निकम्मे हो जाते हैं, उनकी श्री नष्ट हो जाती है अतः सूर्योदय से पूर्व उठना चाहिए, यह मुर्गे का मुख्य गुण है। बंधुओं को उनका भाग देना चाहिए, शत्रु पर आक्रमण के लिए तैयार रहना चाहिए तथा खाने के मामले में भी आलस्य न करना चाहिए ताकि बल बना रहे। गूढ़ं च मैथुन धाष्ट्र्यं काले काले च संग्रहम्। अप्रमत्तमविश्वासं पंच शिक्षेच्च वायसात्॥ मैथुन (स्त्री संभोग) गुप्त स्थान में करना चाहिए, छिपकर चलना चाहिए, समय-समय पर सभी इच्छित वस्तुओं का संग्रह करना चाहिए, सभी कार्यों में सावधानी रखनी चाहिए और किसी का जल्दी विश्वास नहीं करना चाहिए। ये पांच बातें कौवे से सीखनी चाहिए॥20॥ कौआ सदैव एकान्त में ही रति-क्रिया करता है, चालाकी से वह भोजन एकत्र करता रहता है, वह न तो कभी आलस्य और न किसी का विश्वास करता है। बह्वाशी स्वल्पसन्तुष्टः सुनिद्रो लघुचेतनः। स्वामिभक्तश्च शूरश्च षडेते श्वानतो गुणाः॥ बहुत भोजन करने की शक्ति रखने पर भी थोड़े भोजन से ही संतुष्ट हो जाए, अच्छी नींद सोए, परंतु जरा-से खटके पर ही जाग जाए, अपने रक्षक से प्रेम करे और शूरता दिखाए, इन छः गुणों को कुत्ते से सीखना चाहिए॥21॥ 81
मनुष्य सामर्थ्य तो ज्यादा पाने की रखे, किंतु जो मिल जाए उसी पर संतोष कर लेना चाहिए। अच्छी नींद लेनी चाहिए, परंतु सतर्क और चौकन्ना भी रहना चाहिए। अपने मालिक के प्रति स्वामिभक्ति रखनी चाहिए और समय आने पर शूरवीरता दिखाने में पीछे नहीं हटना चाहिए। ये छः गुण कुत्ते में मिल जाते हैं। इसी अध्याय के दूसरे श्लोक में आचार्य चाणक्य ने कुत्ते को नीच जानवर भी कहा है। उन्होंने ऐसा क्यों कहा यह स्पष्ट नहीं है। य एतान् विंशतिगुणानाचरिष्यति मानवः। कार्याऽवस्थासु सर्वासु अजेयः स भविष्यति॥ जो मनुष्य उपरोक्त बीस गुणों को अपने जीवन में उतारकर आचरण करेगा, वह सदैव सभी कार्यों में विजय प्राप्त करेगा॥22॥ इस प्रकार, कोई भी कार्य छोटा हो या बड़ा, उसे एक बार हाथ में लेने पर इन्द्रियों को पूर्ण नियन्त्रण में रखते हुए पूरा करना चाहिए। यह शिक्षा हमें सिंह और बगुले से मिलती है। हमें किसी भी कार्य को बोझ नहीं समझना चाहिए, सर्दी-गर्मी और वातावरण के विपरीत प्रभाव से नहीं घबराना चाहिए तथा सदैव संतोष रखना चाहिए। ये तीन बातें हमें गधे से सीखनी चाहिए। प्रातःकाल जल्दी उठना, प्रतिद्वन्द्वी से संघर्ष करने के लिए सदैव तत्पर रहना, पास की खाद्य वस्तु को परस्पर बांटकर खाना और रति-क्रिया में अपनी स्त्री को संतुष्ट करना, ये चार बातें मुर्गे से सीखनी चाहिए। एकान्त में मैथुन करना, चतुराई में सबसे आगे रहना, 82
आपातकाल के लिए खाद्य-सामग्री का संग्रह करना, न कभी आलस्य करना और न किसी पर विश्वास करना, ये पांच बातें कौए से सीखनी चाहिए। जो मिल जाए, उसी पर संतोष करना, गहरी नींद लेना, चौकन्ना रहना, जरा-सी आहट होने पर जाग जाना, स्वामी के प्रति भक्ति भाव रखना और समय पड़ने पर शत्रु का डटकर सामना करना, ये छः गुण मनुष्य को कुत्ते से सीखने चाहिए। इन गुणों से वह सदैव विजयी रहता है। 83
॥ अथ सप्तम अध्याय ॥ अर्थनाशं मनस्तापं गृहे दुश्चरितानि च। वंचनं चाऽपमानं च मतिमान्न प्रकाशयेत्॥ बुद्धिमान पुरुष धन के नाश को, मन के संताप को, गृहिणी के दोषों को, किसी धूर्त ठग के द्वारा ठगे जाने को और अपमान को किसी से नहीं कहते॥1॥ आचार्य चाणक्य ने यहां मनुष्य की सहनशक्ति की ओर इशारा करते हुए कहा है कि बुद्धिमान व्यक्ति वही है जो अपने और अपने परिवार के नुकसानों और दोषों को छिपाकर सहन कर लेता है क्योंकि उनका प्रदर्शन करने से केवल जग-हंसाई ही होती है। ऐसी बातों को कभी भी अन्य व्यक्तियों के सामने उजागर नहीं करना चाहिए। धनधान्यप्रयोगेषु विद्यासंग्रहणेषु च। आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत्॥ धन और अन्न के लेन-देन में, विद्या ग्रहण करते समय, भोजन और अन्य व्यवहारों में संकोच न रखने वाला व्यक्ति सुखी रहता है॥2॥ 84 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
आचार्य चाणक्य का मानना है कि कई बार संकोच की प्रवृत्ति के कारण मनुष्य को हानि उठानी पड़ती है। मनुष्य के लिए यह जरूरी है कि किसी भी आर्थिक व्यवहार में उसे लिखा-पढ़ी कर लेनी चाहिए। इसमें उसे जरा भी संकोच नहीं करना चाहिए। इसके अलावा विद्या लेते समय, भोजन करते समय कभी संकोच नहीं करना चाहिए। संतोषाऽमृततृप्तानां यत्सुखं शान्तचेतसाम्। न च तद् धनलुब्धानामितश्चेतश्च धावताम्॥ शान्त चित्त वाले संतोषी व्यक्ति को संतोष रूपी अमृत से जो सुख प्राप्त होता है, वह इधर-उधर भटकने वाले धन लोभियों को नहीं होता॥3॥ आचार्य चाणक्य ने उपरोक्त श्लोक के संदर्भ में महर्षि पतंजलि के कथन को देखें तो पाते हैं, संतोष से सर्वश्रेष्ठ सुख की प्राप्ति होती है। याचक दीनता प्रकट करता है, धनी गर्व करता है तथा और अधिक की इच्छा करता है, जिसका धन नष्ट हो गया वह शोक करता है, पर जो संतोषी है, वह सुखी है। मनुष्य को चाहिए कि उसको जो प्राप्त है, जिससे उसकी आवश्यक आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाती है उस पर संतोष करे। कहा गया है, गोधन, गजधन और रतनधन सब धन धूल के समान है। जब संतोष धन इंसान के पास आ जाता है तो वह ध न सभी धन से श्रेष्ठ होता है। संतोषस्त्रिषु कर्त्तव्यः स्वदारे भोजने धने। त्रिषु चैव न कर्त्तव्योऽध्ययने तपंदानयोः॥ अपनी स्त्री, भोजन और धन, इन तीनों में संतोष रखना चाहिए और विद्या अध्ययन, तप और दान करने-कराने में कभी संतोष नहीं करना चाहिए॥4॥ 85
भाग्य से अधिक कुछ नहीं मिलता। भाग्य से ही श्रेष्ठ पत्नी, अच्छा भोजन और विपुल सम्पत्ति प्राप्त होती है। इन्हें जितना और जैसा मिले, उसी पर संतोष करना चाहिए। दूसरी ओर विद्या संग्रह की कोई सीमा नहीं होती। जप और दान करने-कराने से यश प्राप्त होता है। विप्रयोर्विप्रवह्व्योश्च दम्पत्योः स्वामिभृत्ययोः। अंतरेण न गंतव्यं हलस्य वृषभस्य च॥ दो ब्राह्मणों के बीच से, अग्नि और ब्राह्मण के बीच से, पति और पत्नी के बीच से, स्वामी और सेवक के बीच से तथा हल और बैल के बीच से नहीं गुजरना चाहिए॥5॥ जीवन में सजगता बहुत जरूरी है इसीलिए चाणक्य का कहना है कि दो ब्राह्मणों के बीच से गुजरने का अर्थ यही है कि आप उनके वाद-विवाद में विघ्न डाल रहे हैं। अतः कभी उनके बीच से होकर न निकलें। ब्राह्मण और अग्नि के बीच से गुजरने का अर्थ यही है कि आप उनके अग्निहोत्र में विघ्न डाल रहे हैं। पति-पत्नी तथा स्वामी और सेवक के बीच में जब वार्तालाप चल रहा हो, तब बीच से गुजरकर आप उनकी बातों में विघ्न डालते हैं। इसी तरह बैल और हल के बीच से निकलते वक्त चोट लग जाने का भय बना रहता है। अतः इन बातों का ध्यान रखना चाहिए। पादाभ्यां न स्पृशेदाग्नि गुरुं ब्राह्मणमेव च। नैव गां न कुमारीं च न वृद्धं न शिशुं तथा॥ पैर से अग्नि, गुरु, ब्राह्मण, गौ, कन्या, वृद्ध और बालक को कभी नहीं छूना चाहिए॥6॥ इन्हें पैर से स्पर्श करने पर पाप लगता है क्योंकि ये 86
सभी आदरणीय हैं, पूजनीय हैं। इनको पैर से छूना इनका अपमान माना जाता है, इनकी उपेक्षा मानी जाती है। शकटं पंचहस्तेन दशहस्तेन वाजिनम्। हस्ती शतहस्तेन देशत्यागेन दुर्जनम्॥ बैलगाड़ी से पांच हाथ, घोड़े से दस हाथ, हाथी से हजार हाथ दूर बचकर रहना चाहिए और दुष्ट पुरुष (दुष्ट राजा) का देश ही छोड़ देना चाहिए॥7॥ गाड़ी में जुते हुए बैल सींग मार सकते हैं, घोड़ा दुलत्ती मार सकता है, हाथी अपनी सूंड में लपेटकर पटक सकता है और दुष्ट राजा तो जीवन ही खत्म कर सकता है। दुष्ट से सदैव बचकर रहना ही उचित है। उसके लिए अगर देश त्यागना पड़े तो वह भी करना चाहिए। जो जितना अधिक दुष्ट है, उससे उसी अनुपात में दूरी रखते हुए जीवन-यापन करना अच्छा होता है। हस्ती अंकुशहस्तेन वाजी हस्तेन ताड्यते। शृंगी लगुडहस्तेन खड्गहस्तेन दुर्जनः॥ हाथी को अंकुश से, घोड़े को चाबुक से, सींग वाले बैल को डंडे से और दुष्ट व्यक्ति को वश में करने के लिए हाथ में तलवार लेना आवश्यक है॥8॥ आचार्य चाणक्य के अनुसार दुष्ट व्यक्ति को आसानी से न तो वश में किया जा सकता है और न उसे सुधारा जा सकता है। ऐसे व्यक्ति को ठीक करने के लिए कभी-कभी उसे तलवार से मर्मान्तक चोट पहुंचानी पड़ती है। कभी-कभी उसे खत्म भी करना पड़ता है। 87