सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ अथ सप्तम अध्याय ॥ अर्थनाशं मनस्तापं गृहे दुश्चरितानि च। वंचनं चाऽपमानं च मतिमान्न प्रकाशयेत्॥ बुद्धिमान पुरुष धन के नाश को, मन के संताप को, गृहिणी के दोषों को, किसी धूर्त ठग के द्वारा ठगे जाने को और अपमान को किसी से नहीं कहते॥1॥ आचार्य चाणक्य ने यहां मनुष्य की सहनशक्ति की ओर इशारा करते हुए कहा है कि बुद्धिमान व्यक्ति वही है जो अपने और अपने परिवार के नुकसानों और दोषों को छिपाकर सहन कर लेता है क्योंकि उनका प्रदर्शन करने से केवल जग-हंसाई ही होती है। ऐसी बातों को कभी भी अन्य व्यक्तियों के सामने उजागर नहीं करना चाहिए। धनधान्यप्रयोगेषु विद्यासंग्रहणेषु च। आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत्॥ धन और अन्न के लेन-देन में, विद्या ग्रहण करते समय, भोजन और अन्य व्यवहारों में संकोच न रखने वाला व्यक्ति सुखी रहता है॥2॥ 84 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri