सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआचार्य चाणक्य का मानना है कि कई बार संकोच की प्रवृत्ति के कारण मनुष्य को हानि उठानी पड़ती है। मनुष्य के लिए यह जरूरी है कि किसी भी आर्थिक व्यवहार में उसे लिखा-पढ़ी कर लेनी चाहिए। इसमें उसे जरा भी संकोच नहीं करना चाहिए। इसके अलावा विद्या लेते समय, भोजन करते समय कभी संकोच नहीं करना चाहिए। संतोषाऽमृततृप्तानां यत्सुखं शान्तचेतसाम्। न च तद् धनलुब्धानामितश्चेतश्च धावताम्॥ शान्त चित्त वाले संतोषी व्यक्ति को संतोष रूपी अमृत से जो सुख प्राप्त होता है, वह इधर-उधर भटकने वाले धन लोभियों को नहीं होता॥3॥ आचार्य चाणक्य ने उपरोक्त श्लोक के संदर्भ में महर्षि पतंजलि के कथन को देखें तो पाते हैं, संतोष से सर्वश्रेष्ठ सुख की प्राप्ति होती है। याचक दीनता प्रकट करता है, धनी गर्व करता है तथा और अधिक की इच्छा करता है, जिसका धन नष्ट हो गया वह शोक करता है, पर जो संतोषी है, वह सुखी है। मनुष्य को चाहिए कि उसको जो प्राप्त है, जिससे उसकी आवश्यक आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाती है उस पर संतोष करे। कहा गया है, गोधन, गजधन और रतनधन सब धन धूल के समान है। जब संतोष धन इंसान के पास आ जाता है तो वह ध न सभी धन से श्रेष्ठ होता है। संतोषस्त्रिषु कर्त्तव्यः स्वदारे भोजने धने। त्रिषु चैव न कर्त्तव्योऽध्ययने तपंदानयोः॥ अपनी स्त्री, भोजन और धन, इन तीनों में संतोष रखना चाहिए और विद्या अध्ययन, तप और दान करने-कराने में कभी संतोष नहीं करना चाहिए॥4॥ 85