सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
तुष्यन्ति भोजने विप्रा मयूराः घनगर्जिते। साधवः परसम्पत्तौ खलः परविपत्तिषु॥ ब्राह्मण भोजन से संतुष्ट होते हैं, मोर बादलों के गर्जन से, साधु लोग दूसरों की समृद्धि देखकर और दुष्ट लोग दूसरों पर विपत्ति आई देखकर प्रसन्न होते हैं॥9॥ चाणक्य ने इस श्लोक के माध्यम से एक बार फिर दुष्ट व्यक्ति के स्वभाव की व्याख्या की है। दुष्ट का स्वभाव ऐसा बन चुका होता है कि वह दूसरों को हमेशा विपत्ति में देखकर प्रसन्न होता है। कहा गया है—जैसे सज्जन दूसरों का उपकार करने में प्रसन्न होता है वैसे ही दुर्जन अपकार करने के लिए सदा तैयार रहता है। अनुलोमेन बलिनं प्रतिलोमेन दुर्जनम्। आत्मतुल्यबलं शत्रुं विनयेन बलेन वा॥ अपने से शक्तिशाली शत्रु को विनयपूर्वक उसके अनुसार चलकर, दुर्बल शत्रु पर अपना प्रभाव डालकर और समान बल वाले शत्रु को अपनी शक्ति से या फिर विनम्रता से, जैसा अवसर हो उसी के अनुसार व्यवहार करके अपने वश में करना चाहिए॥10॥ यहां चाणक्य ने शत्रु से व्यवहार करते समय इस बात की ओर इशारा किया है कि शत्रु से व्यवहार करने से पूर्व उसकी शक्ति और सामर्थ्य का पूर्वानुमान लगा लेना चाहिए। बाहुवीर्य बल राज्ञो ब्राह्मणो ब्रह्मविद् बली। रूपयौवनमाधुर्यं स्त्रीणां बलमुत्तमम्॥ राजा की शक्ति उसके बाहुबल में, ब्राह्मण की उसके तत्त्वज्ञान में और स्त्रियों की उनके सौंदर्य तथा माधुर्य में होती है।।11।। राजा के बाहुबल और उसकी सेना के द्वारा राजा की 88 CC0. Vashishtha Tripathi Collection Digitized by eGangotri
शक्ति को आंका जाता है, ब्राह्मण की शक्ति को उसकी विद्वता से परखा जाता है और स्त्री को उसके सौंदर्य एवं उसके मधुर-व्यवहार से जांचा जाता है, अर्थात प्रत्येक वस्तु में अपना अलग-अलग गुण होता है, वह गुण उसी को अच्छा लगता है, दूसरे को नहीं। नाऽत्यन्तं सरलैर्भाव्यं गत्वा पश्य वनस्थलीम्। छिद्यन्ते सरलास्तत्र कुब्जास्तिष्ठन्ति पादपाः॥ संसार में अत्यंत सरल और सीधा होना भी ठीक नहीं है। वन में जाकर देखो कि सीधे वृक्ष ही काटे जाते हैं और टेढ़े-मेढ़े वृक्षयों ही छोड़ दिए जाते हैं।। 12 ।। आचार्य चाणक्य ने इस श्लोक में जीवन की सच्चाई की ओर संकेत किया है। सीधापन आदमी की कमजोरी का परिचायक माना जाता है। उसे हर कोई सताने लगता है, परंतु टेढ़े स्वभाव के दुष्ट व्यक्तियों से कोई नहीं उलझता। सभी उनसे बचना चाहते हैं। यत्रोदकं तत्र वसन्ति हंसाः, तथैव शुष्कं परिवर्जयन्ति। न हंसतुल्येन नरेणाभाव्यम्, पुनस्त्यजन्ते पुनराश्रयन्ते॥ जिस सरोवर में जल रहता है, हंस वहीं रहते हैं और सूखे सरोवर को छोड़ देते हैं। पुरुष को ऐसे हंसों के समान नहीं होना चाहिए कि बार-बार स्थान बदलें।। 13 ।। आचार्य चाणक्य का मत है कि मनुष्य के लिए अपना स्वार्थ ही प्रमुख नहीं होना चाहिए। जिस स्थान विशेष से एक बार नाता जोड़ लिया जाए तो उसे कठिनाई आने पर छोड़ना नहीं चाहिए। 89
उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम्। तड़ागोदरसंस्थानां परिस्राव इवाम्भसाम्॥ कमाए हुए धन का दान करते रहना ही उसकी रक्षा है। जैसे तालाब के पानी का बहते रहना उत्तम है।।14।। तालाब का पानी एक ही स्थान पर रुका रहेगा तो वह सड़ जाएगा। इसी प्रकार उपार्जित धन में से दान नहीं किया जाएगा तो उसका महत्त्व ही खत्म हो जाएगा। यस्याऽर्थास्तस्य मित्राणि यस्याऽर्थात्तस्य बांधवाः। यस्याऽर्थाः स पुमांल्लोके यस्याऽर्थाः स च जीवति॥ संसार में जिसके पास धन है, उसी के सब मित्र होते हैं, उसी के सब बंधु-बांधव होते हैं, वही श्रेष्ठ पुरुष गिना जाता है और वही ठाठ-बाट से जीता है।।15।। आचार्य चाणक्य ने उपरोक्त श्लोक के माध्यम से बताया है कि धन के बिना कोई कार्य नहीं चलता। धन परमात्मा नहीं है, परंतु उसका छोटा भाई अवश्य है। जिसके पास धन है वही कुलीन है, विद्वान है, शास्त्रयज्ञ है, गुणी है, वक्ता है। धन कमाओ मगर ईमानदारी से कमाओ। स्वर्गस्थितानामिह जीवलोके, चत्वारि चिह्नानि वसन्ति देहे। दानप्रसंगो मधुरा च वाणी, देवाऽर्चनम् ब्राह्मणतर्पणं च॥ स्वर्ग से इस लोक में आने पर लोगों में चार लक्षण प्रकट होते हैं—दान देने की प्रवृत्ति, मधुर वाणी, देवताओं का पूजन और ब्राह्मणों को भोजन देकर संतुष्ट करना।।16।। 90
इन चार गुणों द्वारा उनकी दिव्यता का पता चलता है। अपने गुणों से वे पृथ्वी पर स्वर्ग के सभी सुखों का अहसास करा देते हैं। अत्यन्तकोपः कटुका च वाणी, दरिद्रता च स्वजनेषु वैरम्। नीचप्रसंगः कुलहीनसेवा, चिह्नानि देहे नरकास्थितानाम्॥ अत्यन्त क्रोध करना, कड़वी वाणी बोलना, दरिद्रता और अपने सगे-सम्बन्धियों से वैर-विरोध करना, नीच पुरुषों का संग करना, छोटे कुल के व्यक्ति की नौकरी अथवा सेवा करना—ये छः दुर्गुण ऐसे हैं जिनसे युक्त मनुष्य को पृथ्वीलोक में ही नरक के दुःखों का आभास हो जाता है॥17॥ इस श्लोक का अर्थ यह है कि क्रोध, कड़वी बात, द्वेष, कुसंग, दरिद्रता और नीच व्यक्ति की सेवा दुष्ट लोगों के लक्षण हैं। इन दुर्गुणों के कारण वे यहीं पर नरक के समान यातना भोगते रहते हैं। गम्यते यदि मृगेन्द्र-मंदिरं, लभ्यते करिकपोल मौक्तिकम्। जम्बुकाऽऽलयगते च प्राप्यते, वत्स-पुच्छ-खर-चर्म खंडनम्॥ मनुष्य यदि सिंह की मांद के निकट जाता है तो गजमोती पाता है और सियार की मांद के पास से तो बछड़े की पूंछ और गधे के चमड़े का टुकड़ा ही पाता है॥18॥ भाव यह है कि बड़े लोगों के पास जाने से धन-सम्पत्ति और ऐश्वर्य प्राप्त होता है और छोटे तथा नीच लोगों की संगति करने से सिवाय दुःख के और कुछ भी प्राप्त नहीं होता। शुनः पुच्छमिव व्यर्थं जीवितं विद्यया विना। न गुह्यगोपने शक्तं न च दंशनिवारणे॥ जिस प्रकार कुत्ते की पूंछ गुप्त स्थानों को ढांप सकने में 91
व्यर्थ है और मच्छरों को काटने से भी नहीं रोक पाती, उसी प्रकार बिना विद्या के मनुष्य जीवन व्यर्थ है।। 19।। जिस प्रकार कुत्ते की पूंछ से न तो उसके गुप्त अंग छिपते हैं और न वह मच्छरों को काटने से रोक सकती है, उसी प्रकार विद्या-विहीन पुरुष मूर्खता के कारण अपनी रक्षा करने में असमर्थ होता है। वह अपना भरण-पोषण भी ठीक से नहीं कर पाता। वाचः शौचं च मनसः शौचमिन्द्रयनिग्रहः। सर्वभूते दया शौचं एतच्छौचं पराऽर्थिनाम्॥ बोलचाल अथवा वाणी में पवित्रता, मन की स्वच्छता और यहां तक कि इन्द्रियों को वश में रखकर पवित्र रहने का भी कोई महत्त्व नहीं, जब तक कि मनुष्य के मन में जीवनमात्र के लिए दया की भावना उत्पन्न नहीं होती। सच्चाई यह है कि परोपकार ही सच्ची पवित्रता है। बिना परोपकार की भावना के मन, वाणी और इन्द्रियां पवित्र नहीं हो सकतीं। व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने मन में दया और परोपकार की भावना को बढ़ाए॥20॥ आचार्य चाणक्य ने उपरोक्त श्लोक के द्वारा अनेक पवित्रताओं की बात की है। ब्रह्मचर्य, तप, क्षमा, शराब और मांस का त्याग, मर्यादा के भीतर रहना और मन को वश में करना, ये सारी बातें शौच पवित्रता के लक्षण हैं। पुष्पे गंध तिले तैलं काष्ठेऽग्निं पयसि घृतम्। इक्षौ गुडं तथा देहे पश्याऽऽत्मानं विवेकतः॥ जिस प्रकार फूल में गंध, तिलों में तेल, लकड़ी में आग, दूध में घी, गन्ने में मिठास आदि दिखाई न देने पर भी विद्यमान रहते 92 CC0. Vasistha Tripathi Collection Digitized by eGangotri
हैं, उसी प्रकार मनुष्य के शरीर में दिखाई न देने वाली आत्मा निवास करती है। यह रहस्य ऐसा है कि इसे विवेक से ही समझा जा सकता है॥21॥ मनुष्य को चाहिए कि वह इस रहस्य को समझने का प्रयास करे कि वह शरीर न होकर आत्मा है। आत्मारूपी तत्त्व इस देह में उसी प्रकार विद्यमान रहता है, जिस प्रकार फूलों में गंध, तिलों में तेल और लकड़ी में अग्नि तथा गन्ने में मिठास और दूध में घी विद्यमान होने पर भी दिखाई नहीं देते। 93
॥ अथ अष्टम अध्याय ॥ अधमा धनमिच्छन्ति धनं मानं च मध्यमाः। उत्तमा मानमिच्छन्ति मानो हि महतां धनम्॥ निकृष्ट लोग धन की कामना करते हैं, मध्यम लोग धन और यश दोनों चाहते हैं और उत्तम लोग केवल यश ही चाहते हैं क्योंकि मान-सम्मान सभी प्रकार के धनों में श्रेष्ठ है।। 1 ।। जिस जीवन में मनुष्य को मान-सम्मान नहीं मिलता, वह जीवन धन से भरपूर होने पर भी व्यर्थ है। धन नष्ट हो जाता है, परंतु आदमी का यश उसके मरने के बाद भी अमर रहता है। इक्षुरापः पयो मूलं ताम्बूलं फलमौषधम्। भक्षयित्वापि कर्तव्याः स्नानदानाऽऽदिका क्रियाः॥ ईख, जल, दूध, मूल (कन्द), पान, फल और दवा आदि का सेवन करके भी, स्नान-दान आदि क्रियाएं की जा सकती हैं।।2।। भाव यह है कि यदि रोगी व्यक्ति औषधि, जल, दूध, फल आदि लेने के उपरान्त कर्मकांड करता है तो वह पाप कर्म का भागी नहीं होता। 94 CC0. Vasistha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
दीपो भक्ष्यते ध्वान्तं कज्जलं च प्रसूयते। यदन्नं भक्ष्यते नित्यं जायते तादृशी प्रजा॥ जैसे दीपक का प्रकाश अंधकार को खा जाता है और कालिख को पैदा करता है, उसी तरह मनुष्य सदैव जैसा अन्न खाता है, वैसी ही उसकी संतान होती है॥3॥ यदि मनुष्य गलत तरीकों से कमाए धन का अन्न खाता है तो उसकी संतान भी उसी तरह के गलत कार्यों में लग जाएगी और यदि आदमी ईमानदारी से कमाए अन्न को खाता है तो उसकी संतान भी ईमानदार होगी इसलिए परिश्रम और ईमानदारी से प्राप्त अन्न खाना ही श्रेष्ठ है। वित्तं देहि गुणान्वितेषु मतिमन्नान्यत्र देहि क्वचित्, प्राप्तं वारिनिधेर्जलं घनमुखे माधुर्ययुक्तं सदा। जीवान् स्थावरजंगमांश्च सकलान् संजीव्य भूमण्डलम्, भूयः पश्य तदेव कोटिगुणितं गच्छन्तमम्भोनिधिम्॥ हे बुद्धिमान पुरुष! धन गुणवानों को दे, अन्य को नहीं। देखो, समुद्र का जल मेघों के मुंह में जाकर सदैव मीठा हो जाता है और पृथ्वी के चर-अचर जीवों को जीवनदान देकर कई करोड़ गुना होकर फिर से समुद्र में चला जाता है॥4॥ दान की महिमा अपरम्पार है, परंतु दान उसे ही देना चाहिए जो सुपात्र हो। सुपात्र के पास जाने से दान दी गई वस्तु अथवा धन का समुचित उपयोग होता है। दुष्ट के पास जाकर दान की गई वस्तु का उपयोग स्वार्थ से प्रेरित होकर ही हो पाता है। मेघों के पास जाकर समुद्र का खारा पानी मीठा हो जाता है और करोड़ों जीवों की प्यास बुझाकर फिर से सागर में जा मिलता है। इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि उचित व्यक्ति को दिया गया दान ही अच्छा होता है। 95
चाण्डालानां सहस्रे च सूरिभिस्तत्त्वदर्शिभिः। एको हि यवनः प्रोक्तो न नीचो यवनात्परः॥ तत्त्वदर्शी मुनियों ने कहा है कि हजारों चांडालों के बराबर एक यवन (म्लेच्छ) होता है। यवन से बढ़कर कोई नीच नहीं है॥5॥ यहां तात्कालिक यवन आक्रमणकारियों से त्रस्त भारत-भूमि की दारुण दशा देखकर ही आचार्य चाणक्य ने यवनों को चांडाल कहा है। यहां यवनों को आप अधर्मी भी कह सकते हैं, जिनकी हिन्दू धर्म में आस्था नहीं है। तैलाभ्यंगे चिताधूमे मैथुने क्षौरकर्मणि। तावद्भवति चांडालो यावत् स्नानं न चाऽऽचरेत॥ (शरीर में) तेल लगाने पर, चिता का धुआं लगने पर, स्त्री-संभोग करने पर, बाल कटवाने पर, मनुष्य तब तक चांडाल, अर्थात अशुद्ध ही रहता है, जब तक वह स्नान नहीं कर लेता॥6॥ आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक के माध्यम से सांसारिक रीति-नीति की जानकारी दी है। श्मशान भूमि से चिता का धुआं लगने पर तथा संभोग करने के बाद स्नान की बात तो सभी की जानकारी में है पर तेल मालिश या हजामत बनवाने के बाद स्नान करने का कार्य इतना महत्त्वपूर्ण है यह कम लोग ही जानते हैं। अजीर्णे भेषजं वारि जीर्णे वारि बलप्रदम्। भोजने चामृतं वारि भोजनान्ते विषं प्रदम्॥ अपच होने पर पानी दवा है, पचने पर बल देने वाला है, भोजन के समय थोड़ा-थोड़ा जल अमृत के समान है और भोजन के अंत में जहर के समान फल देता है॥7॥ 96 सम्पूर्ण चाणक्य नीति—6
आचार्य चाणक्य ने आयुर्वेदिक चिकित्सा का भी जगह-जगह अच्छा वर्णन किया है। इससे पता चलता है कि उन्हें आयुर्वेद का अच्छा ज्ञान था। हतं ज्ञानं क्रियाहीनं हतश्चाऽज्ञानतो नरः। हतं निर्नायकं सैन्यं स्त्रियो नष्टा ह्यभर्तृकाः॥ बिना क्रिया के ज्ञान व्यर्थ है, ज्ञानहीन मनुष्य मृतक के समान है, सेनापति के बिना सेना नष्ट हो जाती है और पति के बिना स्त्रियां पतित हो जाती हैं, अर्थात पति के बिना उनका जीवन व्यर्थ है॥8॥ यदि पढ़ा-लिखा व्यक्ति विद्या को व्यवहार में नहीं लाता तो उसका विद्या प्राप्त करना व्यर्थ है। इसी तरह अज्ञानी व्यक्ति के जीवन को भी व्यर्थ कहा गया है। भले-बुरे की समझ तो समझदार अर्थात ज्ञानी व्यक्ति को ही हो सकती है परंतु मूर्ख व्यक्ति को जब इसका ज्ञान ही नहीं तो वह भला किसका हित कर सकता है। सेनापति के अभाव में सेना दिग्भ्रमित होकर नष्ट हो जाती है और जिस स्त्री के सिर पर पति का साया न हो, उसकी रक्षा भला कौन करता है। सभी उसे पतन की ओर धकेलते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि आचरण के बिना ज्ञान व्यर्थ है तथा पति के बिना स्त्री का कोई अस्तित्व नहीं होता। वृद्धकाले मृता भार्या बंधुहस्ते गतं धनम्। भोजनं च पराधीनं तिस्रः पुंसां विडम्बना॥ बुढ़ापे में स्त्री का मर जाना, बंधु के हाथों में धन का चला जाना और दूसरे के आसरे पर भोजन का प्राप्त होना, ये तीनों ही स्थितियां पुरुषों के लिए दुःखदायी हैं॥9॥ वृद्धावस्था में पत्नी ही सबसे बड़ा सहारा होती है और बचाकर रखा हुआ धन ही काम आता है। इससे आदमी भोजन के 97
लिए पराधीन नहीं होता। अतः पत्नी भी यदि साथ छोड़ जाए तो बुढ़ापे के लिए थोड़ा धन बचाकर जरूर रखना चाहिए। नाग्निहोत्रं विना वेदा न च दानं विना क्रिया। न भावेन विना सिद्धिस्तस्माद् भावो हि कारणम्॥ यज्ञ न करने वाले का वेद पढ़ना व्यर्थ है। बिना दान के यज्ञ करना व्यर्थ है। बिना भाव के सिद्धि नहीं होती इसलिए भाव अर्थात प्रेम ही सब में प्रधान है॥10॥ भाव के बिना कोई भी कार्य सम्पन्न नहीं होता। अतः सभी कार्यों में आस्था जरूरी है। काष्ठपाषाणधातूनां कृत्वा भावेन सेवनम्। श्रद्धया च तयां सिद्धिस्तस्य विष्णोः प्रसीदति॥ लकड़ी, पत्थर और धातु-सोना, चांदी, तांबा, पीतल आदि की बनी देवमूर्ति में देव-भावना अर्थात देवता को साक्षात रूप से विद्यमान समझकर ही श्रद्धासहित उसकी पूजा-अर्चना करनी चाहिए। जो मनुष्य जिस भाव से मूर्ति का पूजन करता है, श्री विष्णुनारायण की कृपा से उसे वैसी ही सिद्धि प्राप्त होती है॥11॥ सच्ची श्रद्धा ही सच्ची पूजा-अर्चना है। मूर्ति चाहे जिस धातु की भी हो, जो मनुष्य जिस भाव से मूर्ति का पूजन करता है, उस पर ईश्वर उतना ही प्रसन्न होता है। शान्तितुल्यं तपो नास्ति न संतोषात् परंसुखम्। न तृष्णायाः परा व्याधिर्न च धर्मो दयापरः॥ शान्ति के बराबर दूसरा तप नहीं है, संतोष से बढ़कर कोई सुख नहीं है, लालच से बड़ा कोई रोग नहीं है और दया से बड़ा कोई धर्म नहीं है॥12॥ 98 CC0. Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
शान्ति, संतोष और दया से जीवन सुखमय होता है और लालच आदमी को रोग रूपी अंधे कुएं में धकेल देता है। 'लालच बुरी बला' की कहावत जगत प्रसिद्ध है। स्वार्थी आदमी कभी सुखी नहीं हो सकता। क्रोध और तृष्णा का त्याग कर देना चाहिए। क्रोधो वैवस्वतो राजा तृष्णा वैतरणी नदी। विद्या कामदुधा धेनुः संतोषो नन्दनं वनम्॥ क्रोध यमराज की मूर्ति है, लालच वैतरणी नदी (नरक में बहने वाली नदी) है, विद्या कामधेनु गाय है और संतोष इंद्र के नन्दन वन जैसा सुख देने वाला है॥13॥ क्रोध आदमी को मृत्यु की ओर धकेलता है, लालच अनेक कष्टों को जन्म देता है, विद्या मनोवांछित फल देने वाली है और संतोष से आत्म-सुख मिलता है। गुणो भूषयते रूपं शीलं भूषयते कुलम्। सिद्धिर्भूषयते विद्यां भोगो भूषयते धनम्॥ गुण से रूप की शोभा होती है, शील से कुल की शोभा होती है, सिद्धि से विद्या की शोभा होती है और भोग से धन की शोभा होती है॥14॥ यहां भोग से आशय यह है कि धन का उपयोग जब तक सत्कर्मों में नहीं किया जाता, तब तक धन की शोभा नहीं हो सकती। इसी प्रकार सौंदर्य तभी शोभा पाता है, जब उसे धारण करने वाला गुणी भी हो। विद्या वही शोभित होती है, जो अपने लक्ष्य को प्राप्त कर ले और आदमी का शील-स्वभाव उसके कुल की शोभा बढ़ाने वाला होता है। 99
निर्गुणस्य हतं रूपं दुःशीलस्य हतं कुलम्। असिद्धस्य हता विद्या अयभोगेन हतं धनम्॥ गुणहीन व्यक्ति की सुंदरता व्यर्थ है, दुष्ट स्वभाव वाले व्यक्ति का कुल नष्ट होने योग्य है, यदि लक्ष्य की सिद्धि न हो तो विद्या व्यर्थ है, जिस धन का सदुपयोग न हो, वह धन व्यर्थ है।।15।। आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक में गुण और आचरण की बात कही है, वहीं विद्या के विषय में भी बताया है। विद्या जो आजीविका उपलब्ध न करा सके वह उसी तरह व्यर्थ है जैसे ध न उपयोग में आए बगैर अनुपयोगी पड़ा हुआ है। शुद्धं भूमिगतं तोयं शुद्धा नारी पतिव्रता। शुचिः क्षेमकरो राजा संतोषी ब्राह्मणः शुचिः॥ पृथ्वी के भीतर का पानी शुद्ध होता है, पतिव्रता स्त्री पवित्र होती है, कल्याण करने वाला राजा पवित्र होता है और संतोषी ब्राह्मण पवित्र होता है।।16।। आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक के माध्यम से जानकारी दी है कि भूमि के भीतर प्रविष्ट हुआ जल पवित्र होता है। वर्षा का अधिकांश जल तो बहकर नाले-नदियों द्वारा समुद्र में चला जाता है। यही जल कुओं, नदियों और तालाबों में भूमि के स्रोतों से आता रहता है। असंतुष्टाः द्विजा नष्टाः संतुष्टाश्च महीभृतः। सलज्जा गणिका नष्टाः निर्लज्जाश्च कुलांगना॥ असंतोषी ब्राह्मण और संतोषी राजा (जल्दी ही) नष्ट हो जाते हैं। लज्जाशील वेश्या और निर्लज्ज कुलीन स्त्री नष्ट हो जाती है।।17।। लोभ से प्रेरित ब्राह्मण आदर का पात्र नहीं रहता और 100
महत्त्वकांक्षा न रखने वाला राजा आलसी और अकर्मण्य होकर नष्ट हो जाता है। संकोच करने वाली वेश्या ग्राहकों को प्रसन्न न करने के कारण अपना धंधा चौपट कर लेती है और बेशर्म कुलीन स्त्री दूसरों की विषय-वासना का शिकार होकर पतित हो जाती है। किं कुलेन विशालेन विद्याहीनेन देहिनाम। दुष्कुलीनोऽपि विद्वांश्च देवैरपि सुपूज्यते॥ विद्याविहीन अर्थात मूर्ख व्यक्तियों के बड़े कुल के होने से क्या लाभ? विद्वान व्यक्ति का नीच कुल भी देवगणों से सम्मान पाता है।: 18।। विद्याविहीन व्यक्ति पशु के समान है। विद्वान व्यक्ति का ही महत्त्व है। विद्वान प्रशस्यते लोके विद्वान् गच्छति गौरवम्। विद्यया लभ्यते सर्वं विद्या सर्वत्र पूज्यते॥ संसार में विद्वान की ही प्रशंसा होती है, विद्वान व्यक्ति ही सभी जगह पूजे जाते हैं। विद्या से ही सब कुछ मिलता है, विद्या की सब जगह पूजा होती है।।19।। यश की प्राप्ति विद्या के द्वारा ही होती है। जो व्यक्ति जितना बड़ा विद्वान होगा, उसका सम्मान उतना ही ज्यादा होगा। मांसभक्षैः सुरापानैर्मूर्खैश्चाक्षरवर्जितैः। पशुभिः पुरुषाकारैर्भाराऽऽक्रान्ता च मेदिनी॥ जो व्यक्ति मांस और मदिरा का सेवन करते हैं, वे इस पृथ्वी पर बोझ हैं। इसी प्रकार जो व्यक्ति निरक्षर हैं, वे भी पृथ्वी पर बोझ हैं। इस प्रकार के मनुष्य रूपी पशुओं के भार से यह पृथ्वी हमेशा पीड़ित और दबी रहती है।।20।। CCO. Vasishtha Tripathi 101lection. Digitized by eGangotri
जिस धरती पर मांस खाने वाले, शराब पीने वाले और मूर्खों की बहुतायत होती है, वहां के पुरुष पशुओं के समान होते हैं। ऐसे दुष्ट पशुरूपधारी पुरुष धरती के लिए बोझ होते हैं और इस पर रहने वाले सभी प्राणियों को कष्ट ही पहुंचाते हैं। अन्नहीनो दहेद् राष्ट्रं मंत्रहीनश्च ऋत्विजः। यजमानं दानहीनो नास्ति यज्ञसमो रिपुः॥ अन्नहीन यज्ञ राजा को, मंत्रहीन यज्ञ कराने वाले ऋत्विजों को और दानहीन यज्ञ यजमान को जलाता है। यज्ञ के बराबर कोई शत्रु नहीं है॥21॥ भाव यह है कि यज्ञ बड़ी सावधानी और मंत्रों की शुद्धता के साथ करना चाहिए। यज्ञ करने के उपरांत यजमान द्वारा दान भी दिया जाना चाहिए। रूपयौवनसम्पन्ना विशालकुलसम्भवाः। विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुका॥ रूप-यौवन से सम्पन्न, बड़े कुल में पैदा होते हुए भी, विद्याविहीन पुरुष, बिना गंध के फूल पलाश के समान शोभा अर्थात आदर को प्राप्त नहीं होता॥22॥ विद्या का ही सर्वत्र आदर होता है। 102
॥ अथ नवम अध्याय ॥ मुक्तिमिच्छसि चेत्तात! विषयान् विषवत् त्यज। क्षमाऽऽर्गवं दय शौचं सत्यं पीयूषवत् पिब ॥ यदि मुक्ति चाहते हो तो समस्त विषय-वासनाओं को विष के समान छोड़ दो और क्षमाशीलता, नम्रता, दया, पवित्रता और सत्यता को अमृत की भांति पियो अर्थात अपनाओ।।1।। भाव यह है कि मनुष्य मोह-माया तथा इच्छाओं का परित्याग करके क्षमा, सहनशीलता, दया, पवित्रता और सत्य का आचरण करे तो उसे मोक्ष प्राप्त हो सकता है। जन्म-मरण के बंधनों से छूटना ही मोक्ष है। परस्परस्य मर्माणि ये भाषन्ते नराधमाः। त एव विलयं यान्ति वल्मीकोदरसर्पवत् ॥ जो नीच व्यक्ति परस्पर की गई गुप्त बातों को दूसरों से कह देते हैं, वे ही दीमक के घर में रहने वाले सांप की भांति नष्ट हो जाते हैं॥2॥ CCO. Vasishtha Tripathi 105 Collection. Digitized by eGangotri
अध्याय १०-१२: आत्म-रक्षा, गुप्त-मन्त्रणा व नीति-सार
मित्र के गुप्त रहस्यों को कभी प्रकट न करें। इससे केवल शत्रुता ही पैदा होती है। गंधः सुवर्णे फलमिक्षुदंडे, नाऽकारि पुष्पं खलु चंदनस्य। विद्वान धनाढ्यश्च नृपश्चिरायुः, धातुः पुराकोऽपि न बुद्धिदोऽभूत् ॥ ब्रह्मा को शायद कोई बताने वाला नहीं मिला जो कि उन्होंने सोने में सुगंध, ईख में फल, चंदन में फूल, विद्वान को धनी और राजा को चिरंजीवी नहीं बनाया।।3।। यह सृष्टिकर्त्ता की कैसी विडम्बना है कि उसने स्वर्ण में सुगंध नहीं डाली, गन्ने पर फल नहीं लगाया, चंदन के वृक्ष पर फूल नहीं उगाए, विद्वान को धनवान नहीं बनाया और राजा को, जो कि प्रजापालक है, दीर्घजीवी नहीं बनाया। सर्वौषधीनाममृता प्रधाना, सर्वेषु सौख्येष्वशनं प्रधानम्। सर्वेन्द्रियाणां नयनं प्रधानं, सर्वेषु गात्रेषु शिरः प्रधानम् ॥ सभी औषधियों में अमृत प्रधान है, सभी सुखों में भोजन प्रधान है, सभी इन्द्रियों में नेत्र प्रधान है और सारे शरीर में सिर श्रेष्ठ है।।4।। अमृत से जीवन को अमरता प्राप्त होती है, भोजन से शरीर पुष्ट होता है, तृप्ति प्राप्त होती है, आंखों के बिना सारा संसार ही अंधकार में डूब जाता है और दिमाग के बिना तो चिन्तन ही असंभव है। दूतो न संचरति खे न चलेच्च वार्ता पूर्वं न जल्पितमिदं न च संगमोऽस्ति। व्योम्नि स्थितं रविशशिग्रहणं प्रशस्तं जानाति यो द्विजवरः स कथं न विद्वान् ॥ न तो आकाश में कोई दूत गया, न इस संबंध में किसी से 104 CC0. Vasishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri
बात हुई, न पहले किसी ने इसे बनाया और न कोई प्रकरण ही आया, तब भी आकाश में भ्रमण करने वाले चंद्र और सूर्य के ग्रहण के बारे में जो ब्राह्मण पहले से ही जान लेता है, वह विद्वान क्यों नहीं है? अर्थात् वास्तव में वह विद्वान है, जिसकी गणना से ग्रहों की चाल का सही-सही पता लगाया जाता रहा है॥5॥ आचार्य चाणक्य ने प्रस्तुत श्लोक में उन विद्वानों की विद्वता की प्रशंसा की है जिन्होंने सूर्य-चंद्र की स्थितियों की हमें जानकारी दे रखी है। आकाश में कोई दूत नहीं जा सकता, न ही वहां किसी से कोई वार्तालाप हो सकता है, न पहले से किसी ने कुछ बता ही रखा है और न वहां किसी से संगम हो सकता है, फिर भी जो ब्राह्मण श्रेष्ठ आकाश में स्थित सूर्य और चंद्रमा के ग्रहण को जान लेता है, वह विद्वान क्यों नहीं है? विद्यार्थी सेवकः पान्थः क्षुधाऽऽर्त्तो भयकातरः। भाण्डारी प्रतिहारी च सप्त सुप्तान् प्रबोधयेत् ॥ विद्यार्थी, नौकर, पथिक, भूख से व्याकुल, भय से त्रस्त, भंडारी और द्वारपाल, इन सातों को सोता हुए देखें तो तत्काल जगा देना चाहिए क्योंकि अपने समस्त कर्मों और कर्त्तव्यों का पालन ये जागकर अर्थात सचेत होकर ही करते हैं॥6॥ विद्यार्थी यदि सोयेगा तो पढ़ेगा कैसे ? नौकर यदि सोयेगा तो डांका पड़ सकता है, मुसाफिर यदि सोयेगा तो लुट जाएगा, भूख से व्याकुल व्यक्ति को भोजन करा देना चाहिए। उसे तो वैसे ही नींद न आएगी। भंडारगृह का स्वामी और द्वारपाल सोते रहेंगे तो चोरों को चोरी करने का अवसर मिल सकता है। अतः इन्हें सदैव सावधान रहना चाहिए। 105 CC0. Vasishtha Tripathi Collection Digitized by eGangotri
अहिं नृपं च शार्दूलं किटिंच बालकं तथा। परश्वानं च मूर्खं च सप्त सुप्तान् बोधयेत् ॥ सांप, राजा, सिंह, बर्र (ततैया) और बालक, दूसरे का कुत्ता तथा मूर्ख व्यक्ति, इन सातों को सोते से नहीं जगाना चाहिए। इन्हें जगाने से हानि ही हो सकती है॥7॥ आचार्य चाणक्य ने उपरोक्त श्लोक में जिन सात को सोते से न जागने की बात कही है उनकी हानि इस प्रकार है—सांप डस लेगा, राजा दंड देगा, व्याघ्र या चीता आक्रमण कर मार डालेगा, बालक रोने लगेगा, दूसरों का कुत्ता जगाए जाने पर काट लेगा, मूर्ख व्यक्ति विवाद करने लगेगा। अर्थाऽधीताश्च यैर्वेदास्तथा शूद्रान्नभोजिनाः। ते द्विजाः किं करिष्यन्ति निर्विषा इव पन्नगाः ॥ धन के लिए वेद पढ़ाने वाले तथा शूद्रों के अन्न को खाने वाले ब्राह्मण विषहीन सर्प की भांति क्या कर सकते हैं, अर्थात वे किसी को न तो शाप दे सकते हैं, न वरदान॥8॥ जो ब्राह्मण केवल धन के लिए ही अपनी विद्या को बेचते हैं, शूद्रों के यहां का भोजन करने से भी संकोच नहीं करते, ऐसे ब्राह्मणों की विद्या उस सर्प के समान है, जिसके मुख में विष की थैली ही नहीं है। अर्थात वे किसी को न तो शाप दे सकते हैं, न वरदान। यस्मिन् रुष्टे भयं नास्ति तुष्टे नैव धनाऽऽगमः। निग्रहोऽनुग्रहो नास्ति स रुष्टः किं करिष्यति ॥ जिसके नाराज होने का डर नहीं है और प्रसन्न होने से कोई लाभ नहीं है, जिसमें दंड देने या दया करने की सामर्थ्य नहीं है, वह नाराज होकर क्या कर सकता है?॥9॥ 106
भयभीत उसी से हुआ जा सकता है, जिसमें कुछ दंड देने की सामर्थ्य हो। जिसमें ऐसी सामर्थ्य नहीं है, उससे डर कैसा ? अपना हानि-लाभ देखकर ही कोई किसी से प्रभावित होता है। निर्विषेणाऽपि सर्पेण कर्तव्या महती फणा। विषमस्तु न चाप्यस्तु घटाटोपो भयंकरः ॥ विषहीन सर्प को भी अपना फन फैलाकर फुफकार करनी चाहिए। विष के न होने पर फुफकार से उसे डराना अवश्य चाहिए।।10।। यदि विषहीन सांप ऐसा नहीं करेगा तो वह अपना बचाव नहीं कर पाएगा। लोग उसे पत्थर मारेंगे। तात्पर्य यह है कि राजा के पास शक्ति चाहे थोड़ी हो, पर उसे अपनी शक्ति का दिखावा करके शत्रु को भयभीत अवश्य करते रहना चाहिए। प्रातर्धूतप्रसंगेन मध्यान्हे स्त्रीप्रसंगतः। रात्रौ चौर्यप्रसंगेन कालो गच्छत्ये धीमताम्॥ प्रातःकाल जुआरियों की कथा से (महाभारत की कथा से), मध्याह्न (दोपहर) का समय स्त्री प्रसंग से (रामायण की कथा से) और रात्रि में चोर की कथा से (श्रीमद्भागवत की कथा से) बुद्धिमान लोग अपना समय काटते हैं।।11।। जुआरियों की कथा को महाभारत की कथा से जोड़कर दिखाया है कि राजनीतिकारों को जुए की लत से कितना भारी नुकसान उठाना पड़ता है। स्त्री-प्रसंग की कथा को रामायण से जोड़कर बताया गया है कि पर स्त्री हरण से कितना बड़ा विनाश होने की संभावना रहती है और चोर की कथा को श्रीमद्भागवत से जोड़कर भगवान श्रीकृष्ण की सोलह हजार रानियों के रहते हुए भी इन्द्रिय-निग्रह की भावना का प्रतिपादन किया गया है। 107 CC0 Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri