सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतुष्यन्ति भोजने विप्रा मयूराः घनगर्जिते। साधवः परसम्पत्तौ खलः परविपत्तिषु॥ ब्राह्मण भोजन से संतुष्ट होते हैं, मोर बादलों के गर्जन से, साधु लोग दूसरों की समृद्धि देखकर और दुष्ट लोग दूसरों पर विपत्ति आई देखकर प्रसन्न होते हैं॥9॥ चाणक्य ने इस श्लोक के माध्यम से एक बार फिर दुष्ट व्यक्ति के स्वभाव की व्याख्या की है। दुष्ट का स्वभाव ऐसा बन चुका होता है कि वह दूसरों को हमेशा विपत्ति में देखकर प्रसन्न होता है। कहा गया है—जैसे सज्जन दूसरों का उपकार करने में प्रसन्न होता है वैसे ही दुर्जन अपकार करने के लिए सदा तैयार रहता है। अनुलोमेन बलिनं प्रतिलोमेन दुर्जनम्। आत्मतुल्यबलं शत्रुं विनयेन बलेन वा॥ अपने से शक्तिशाली शत्रु को विनयपूर्वक उसके अनुसार चलकर, दुर्बल शत्रु पर अपना प्रभाव डालकर और समान बल वाले शत्रु को अपनी शक्ति से या फिर विनम्रता से, जैसा अवसर हो उसी के अनुसार व्यवहार करके अपने वश में करना चाहिए॥10॥ यहां चाणक्य ने शत्रु से व्यवहार करते समय इस बात की ओर इशारा किया है कि शत्रु से व्यवहार करने से पूर्व उसकी शक्ति और सामर्थ्य का पूर्वानुमान लगा लेना चाहिए। बाहुवीर्य बल राज्ञो ब्राह्मणो ब्रह्मविद् बली। रूपयौवनमाधुर्यं स्त्रीणां बलमुत्तमम्॥ राजा की शक्ति उसके बाहुबल में, ब्राह्मण की उसके तत्त्वज्ञान में और स्त्रियों की उनके सौंदर्य तथा माधुर्य में होती है।।11।। राजा के बाहुबल और उसकी सेना के द्वारा राजा की 88 CC0. Vashishtha Tripathi Collection Digitized by eGangotri