सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशक्ति को आंका जाता है, ब्राह्मण की शक्ति को उसकी विद्वता से परखा जाता है और स्त्री को उसके सौंदर्य एवं उसके मधुर-व्यवहार से जांचा जाता है, अर्थात प्रत्येक वस्तु में अपना अलग-अलग गुण होता है, वह गुण उसी को अच्छा लगता है, दूसरे को नहीं। नाऽत्यन्तं सरलैर्भाव्यं गत्वा पश्य वनस्थलीम्। छिद्यन्ते सरलास्तत्र कुब्जास्तिष्ठन्ति पादपाः॥ संसार में अत्यंत सरल और सीधा होना भी ठीक नहीं है। वन में जाकर देखो कि सीधे वृक्ष ही काटे जाते हैं और टेढ़े-मेढ़े वृक्षयों ही छोड़ दिए जाते हैं।। 12 ।। आचार्य चाणक्य ने इस श्लोक में जीवन की सच्चाई की ओर संकेत किया है। सीधापन आदमी की कमजोरी का परिचायक माना जाता है। उसे हर कोई सताने लगता है, परंतु टेढ़े स्वभाव के दुष्ट व्यक्तियों से कोई नहीं उलझता। सभी उनसे बचना चाहते हैं। यत्रोदकं तत्र वसन्ति हंसाः, तथैव शुष्कं परिवर्जयन्ति। न हंसतुल्येन नरेणाभाव्यम्, पुनस्त्यजन्ते पुनराश्रयन्ते॥ जिस सरोवर में जल रहता है, हंस वहीं रहते हैं और सूखे सरोवर को छोड़ देते हैं। पुरुष को ऐसे हंसों के समान नहीं होना चाहिए कि बार-बार स्थान बदलें।। 13 ।। आचार्य चाणक्य का मत है कि मनुष्य के लिए अपना स्वार्थ ही प्रमुख नहीं होना चाहिए। जिस स्थान विशेष से एक बार नाता जोड़ लिया जाए तो उसे कठिनाई आने पर छोड़ना नहीं चाहिए। 89