सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम्। तड़ागोदरसंस्थानां परिस्राव इवाम्भसाम्॥ कमाए हुए धन का दान करते रहना ही उसकी रक्षा है। जैसे तालाब के पानी का बहते रहना उत्तम है।।14।। तालाब का पानी एक ही स्थान पर रुका रहेगा तो वह सड़ जाएगा। इसी प्रकार उपार्जित धन में से दान नहीं किया जाएगा तो उसका महत्त्व ही खत्म हो जाएगा। यस्याऽर्थास्तस्य मित्राणि यस्याऽर्थात्तस्य बांधवाः। यस्याऽर्थाः स पुमांल्लोके यस्याऽर्थाः स च जीवति॥ संसार में जिसके पास धन है, उसी के सब मित्र होते हैं, उसी के सब बंधु-बांधव होते हैं, वही श्रेष्ठ पुरुष गिना जाता है और वही ठाठ-बाट से जीता है।।15।। आचार्य चाणक्य ने उपरोक्त श्लोक के माध्यम से बताया है कि धन के बिना कोई कार्य नहीं चलता। धन परमात्मा नहीं है, परंतु उसका छोटा भाई अवश्य है। जिसके पास धन है वही कुलीन है, विद्वान है, शास्त्रयज्ञ है, गुणी है, वक्ता है। धन कमाओ मगर ईमानदारी से कमाओ। स्वर्गस्थितानामिह जीवलोके, चत्वारि चिह्नानि वसन्ति देहे। दानप्रसंगो मधुरा च वाणी, देवाऽर्चनम् ब्राह्मणतर्पणं च॥ स्वर्ग से इस लोक में आने पर लोगों में चार लक्षण प्रकट होते हैं—दान देने की प्रवृत्ति, मधुर वाणी, देवताओं का पूजन और ब्राह्मणों को भोजन देकर संतुष्ट करना।।16।। 90