सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ अथ अष्टम अध्याय ॥ अधमा धनमिच्छन्ति धनं मानं च मध्यमाः। उत्तमा मानमिच्छन्ति मानो हि महतां धनम्॥ निकृष्ट लोग धन की कामना करते हैं, मध्यम लोग धन और यश दोनों चाहते हैं और उत्तम लोग केवल यश ही चाहते हैं क्योंकि मान-सम्मान सभी प्रकार के धनों में श्रेष्ठ है।। 1 ।। जिस जीवन में मनुष्य को मान-सम्मान नहीं मिलता, वह जीवन धन से भरपूर होने पर भी व्यर्थ है। धन नष्ट हो जाता है, परंतु आदमी का यश उसके मरने के बाद भी अमर रहता है। इक्षुरापः पयो मूलं ताम्बूलं फलमौषधम्। भक्षयित्वापि कर्तव्याः स्नानदानाऽऽदिका क्रियाः॥ ईख, जल, दूध, मूल (कन्द), पान, फल और दवा आदि का सेवन करके भी, स्नान-दान आदि क्रियाएं की जा सकती हैं।।2।। भाव यह है कि यदि रोगी व्यक्ति औषधि, जल, दूध, फल आदि लेने के उपरान्त कर्मकांड करता है तो वह पाप कर्म का भागी नहीं होता। 94 CC0. Vasistha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri