सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदीपो भक्ष्यते ध्वान्तं कज्जलं च प्रसूयते। यदन्नं भक्ष्यते नित्यं जायते तादृशी प्रजा॥ जैसे दीपक का प्रकाश अंधकार को खा जाता है और कालिख को पैदा करता है, उसी तरह मनुष्य सदैव जैसा अन्न खाता है, वैसी ही उसकी संतान होती है॥3॥ यदि मनुष्य गलत तरीकों से कमाए धन का अन्न खाता है तो उसकी संतान भी उसी तरह के गलत कार्यों में लग जाएगी और यदि आदमी ईमानदारी से कमाए अन्न को खाता है तो उसकी संतान भी ईमानदार होगी इसलिए परिश्रम और ईमानदारी से प्राप्त अन्न खाना ही श्रेष्ठ है। वित्तं देहि गुणान्वितेषु मतिमन्नान्यत्र देहि क्वचित्, प्राप्तं वारिनिधेर्जलं घनमुखे माधुर्ययुक्तं सदा। जीवान् स्थावरजंगमांश्च सकलान् संजीव्य भूमण्डलम्, भूयः पश्य तदेव कोटिगुणितं गच्छन्तमम्भोनिधिम्॥ हे बुद्धिमान पुरुष! धन गुणवानों को दे, अन्य को नहीं। देखो, समुद्र का जल मेघों के मुंह में जाकर सदैव मीठा हो जाता है और पृथ्वी के चर-अचर जीवों को जीवनदान देकर कई करोड़ गुना होकर फिर से समुद्र में चला जाता है॥4॥ दान की महिमा अपरम्पार है, परंतु दान उसे ही देना चाहिए जो सुपात्र हो। सुपात्र के पास जाने से दान दी गई वस्तु अथवा धन का समुचित उपयोग होता है। दुष्ट के पास जाकर दान की गई वस्तु का उपयोग स्वार्थ से प्रेरित होकर ही हो पाता है। मेघों के पास जाकर समुद्र का खारा पानी मीठा हो जाता है और करोड़ों जीवों की प्यास बुझाकर फिर से सागर में जा मिलता है। इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि उचित व्यक्ति को दिया गया दान ही अच्छा होता है। 95